दिल्ली में भाजपा की राजनीति की पहचान लंबे समय तक 11 अशोक रोड से जुड़ी रही। यह वही सरकारी बंगला था, जो वर्षों तक पार्टी का मुख्यालय रहा और जहां देशभर से नेता अपनी राजनीतिक किस्मत आजमाने आते थे। भले ही अब भाजपा का नया मुख्यालय दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर बन चुका है, लेकिन 11 नंबर का आकर्षण आज भी कम नहीं हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि नए भवन में भी एक कक्ष ऐसा है, जिसे ‘रूम नंबर 11’ कहा जाता है और जिसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में लगातार बनी रहती है।

कहा जाता है कि इस कक्ष में आने-जाने वाले कई नेताओं की किस्मत ने करवट ली है। जो नेता कभी टिकट के लिए संघर्ष कर रहे थे, वही आगे चलकर मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद या विधायक बन गए। पार्टी के कुछ लोग इसे महज संयोग नहीं मानते। अंकशास्त्र में विश्वास रखने वालों का कहना है कि भाजपा के तीन अक्षरों का जोड़ भी 11 बनता है, इसलिए यह अंक पार्टी के लिए शुभ माना जाता है। यही वजह है कि छोटे से लेकर बड़े नेता तक इस कक्ष में आने को अपने लिए अच्छा संकेत मानते हैं।

उधर, कांग्रेस शासित एक राज्य में मुख्यमंत्री अपने ही अंदाज में सत्ता संभाले हुए हैं। वे संगठन के शीर्ष नेतृत्व को अपने तरीके से संतुष्ट रखने में माहिर माने जाते हैं। उनकी स्थिति इसलिए भी मजबूत है क्योंकि फिलहाल पार्टी के भीतर उनका कोई बड़ा प्रतिद्वंद्वी नहीं है। हाल ही में उद्योग और निवेश को लेकर एक बड़े कारोबारी से उनकी नजदीकियों पर सवाल उठे, तो मुख्यमंत्री ने राजनीति के एक अनुभवी खिलाड़ी से सलाह ली, जो दूसरे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बताया जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्री ने उन्हें ऐसे राजनीतिक गुर सिखाए कि वे उनके कायल हो गए। अब मुख्यमंत्री हर फैसले को पार्टी की ‘रूल बुक’ के मुताबिक साबित कर देते हैं, जिससे विरोध करने वालों की बोलती बंद हो जाती है।

झारखंड की एक प्रमुख पार्टी के नेताओं के लिए अब दिल्ली जाना आसान नहीं रहा। पार्टी नेतृत्व ने साफ संदेश दे दिया है कि प्रदेश से जुड़ी समस्याएं वहीं सुलझाई जाएं। मंत्रियों और विधायकों को आपसी मतभेद स्थानीय स्तर पर ही निपटाने के निर्देश दिए गए हैं। यदि कोई नेता शिकायत लेकर दिल्ली पहुंचता है, तो उसे बिना सुनवाई के लौटना पड़ सकता है। इस सख्त रुख से प्रदेश के नेता असमंजस में हैं और आपसी तालमेल बढ़ाने के नए तरीके खोज रहे हैं। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि पार्टी में सब कुछ ठीक है।

लखनवी तहजीब का “पहले आप” वाला अंदाज कांग्रेस के एक नेता को भारी पड़ गया। एक राज्य प्रभारी से मिलने पहुंचे दो नेताओं में से कोई भी पहले जाने को तैयार नहीं था। काफी आग्रह के बाद एक नेता अंदर गया और बाद में जब दूसरा पहुंचा, तो उसे बताया गया कि पद पहले वाले को दे दिया गया है। अब वह नेता सोच रहे हैं कि शिष्टाचार निभाना कहीं नुकसानदेह तो नहीं हो गया।

उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए हैं। कभी अपने ही विभाग और अफसरों पर खुलकर हमला करने वाले इस मंत्री को अपने जातीय वोट बैंक पर काफी भरोसा था। वे कई बार पार्टी बदलने के संकेत भी देते रहे, जिसके चलते संगठन उन्हें साधने में लगा रहता था। चुनाव में उन्हें मनपसंद सीट भी मिली, लेकिन हाल के दिनों में उनका प्रभाव कम होता नजर आ रहा है। पार्टी ने अब उनका संतुलन बनाने के लिए संगठन की जिम्मेदारी एक ऐसे वरिष्ठ नेता को सौंप दी है, जो कद में भी बड़े हैं और उसी समाज से आते हैं।

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