Explained: मस्क ने US चुनाव में लगाए 445 मिलियन डॉलर, भारत में कितनी राजनीतिक फंडिंग की अनुमति
अमेरिका में असीमित फंडिंग की इजाजत है, वहीं भारत में चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के लिए उम्मीदवारों के खर्च पर सीमा और चंदे की पारदर्शिता पर अधिक जोर दिया जाता है.

एक रिपोर्ट के अनुसार, अरबपति व्यवसायी एलन मस्क ने अमेरिकी चुनाव चक्र के दौरान रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन करने वाले राजनीतिक समूहों और ‘सुपर पीएसी’ को 445 मिलियन डॉलर (लगभग ₹3,700 करोड़ से अधिक) से अधिक का योगदान दिया है.
अमेरिकी कानून इतनी बड़ी धनराशि के योगदान की कानूनी अनुमति देता है, क्योंकि वहां की संवैधानिक व्यवस्था राजनीतिक खर्च को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का एक अभिन्न रूप मानती है. इसके विपरीत, भारत सहित दुनिया के अन्य प्रमुख लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक फंडिंग, चंदे और चुनावी खर्च पर कई तरह की वैधानिक सीमाएं और पारदर्शिता के नियम लागू हैं.
USA में असीमित खर्च की आजादी
अमेरिका का अभियान वित्त कानून राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों को सीधे दिए जाने वाले चंदे और स्वतंत्र रूप से किए जाने वाले बाहरी खर्च के बीच एक स्पष्ट अंतर रेखा खींचता है.
प्रत्यक्ष चंदा: संघीय कानून के तहत, कोई व्यक्ति किसी उम्मीदवार को सीधे तौर पर प्रति चुनाव अधिकतम $3,500 का चंदा दे सकता है. इसके अतिरिक्त, कोई व्यक्ति किसी राष्ट्रीय पार्टी समिति को प्रतिवर्ष $44,300 तक और किसी पारंपरिक ‘पॉलिटिकल एक्शन कमेटी’ (PAC) को $5,000 तक का चंदा दे सकता है.
सुपर PACs (असीमित फंडिंग): अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों के बाद अस्तित्व में आए ‘सुपर PACs’ किसी भी व्यक्ति, कॉर्पोरेशन या ट्रेड यूनियन से असीमित रकम जुटा सकते हैं और राजनीतिक विज्ञापनों और अभियानों पर बिना किसी सीमा के खर्च कर सकते हैं. इन सुपर PACs को उम्मीदवारों के आधिकारिक चुनाव अभियानों से पूरी तरह स्वतंत्र होकर काम करना होता है. वे सीधे उम्मीदवारों को फंड ट्रांसफर नहीं कर सकते और न ही उनके साथ समन्वय स्थापित कर सकते हैं.
भारत की चुनावी व्यवस्था: उम्मीदवार के खर्च पर कड़े नियम
अमेरिका की उस व्यवस्था के विपरीत जहां राजनीतिक अभियानों और स्वतंत्र समूहों के खर्च पर कोई सीमा नहीं है, भारत में राजनीतिक वित्तपोषण को नियंत्रित करने का प्राथमिक तरीका उम्मीदवारों के व्यक्तिगत चुनावी खर्च पर वैधानिक सीमा तय करना है.
भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ के तहत उम्मीदवारों के प्रचार खर्च की ऊपरी सीमा तय करता है.
लोकसभा चुनाव: बड़े राज्यों में संसदीय सीट से चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार अधिकतम ₹95 लाख खर्च कर सकता है. छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह सीमा ₹75 लाख है.
विधानसभा चुनाव: बड़े राज्यों के विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों के खर्च की सीमा ₹40 लाख और छोटे राज्यों में यह ₹28 लाख सीमित की गई है.
भारत में उम्मीदवार के खर्च पर सख्त सीमा है, लेकिन राजनीतिक दलों के कुल चुनावी खर्च पर कोई कानूनी ऊपरी सीमा लागू नहीं है.
भारत में राजनीतिक चंदे और कॉर्पोरेट फंडिंग के नियम
भारत में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर कई कानूनी प्रावधान लागू होते हैं.
नकद चंदे पर सीमा: किसी भी राजनीतिक दल को प्रति व्यक्ति या संस्था से नकद के रूप में अधिकतम ₹2,000 तक ही चंदा प्राप्त करने की अनुमति है. इससे अधिक की राशि केवल डिजिटल बैंकिंग, चेक या ड्राफ्ट के माध्यम से ही ली जा सकती है.
पारदर्शिता की आवश्यकता: यदि किसी राजनीतिक दल को ₹20,000 से अधिक का दान मिलता है, तो उसे दानदाता की विस्तृत जानकारी के साथ वार्षिक अंशदान रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को सौंपनी होती है.
कॉर्पोरेट फंडिंग: भारत में कंपनियां अपनी लाभप्रदता के आधार पर राजनीतिक दलों को चंदा दे सकती हैं, लेकिन इसका ब्योरा उनके वित्तीय खातों में दर्ज होना अनिवार्य है.
इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए फरवरी 2024 में ‘इलेक्टोरल बॉन्ड योजना’ असंवैधानिक घोषित करते हुए पूरी तरह निरस्त कर दिया था. इसके बाद से बेनामी चुनावी बांड के जरिए गुप्त रूप से फंड देने की व्यवस्था समाप्त हो चुकी है.
विदेशी चंदे पर प्रतिबंध: ‘विदेशी अंशदान नियंत्रण अधिनियम’ (FCRA) के तहत भारतीय राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को विदेशी स्रोतों, संस्थाओं या विदेशी नागरिकों से प्रत्यक्ष चंदा प्राप्त करने पर सख्त रोक है.
अन्य प्रमुख लोकतंत्रों में व्यवस्था
दुनिया के अन्य विकसित लोकतंत्रों में भी धनबल के प्रभाव को रोकने के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं:
ब्रिटेन और कनाडा: इन देशों में व्यक्तिगत चंदे की राशि के साथ-साथ चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों और किसी तीसरे पक्ष द्वारा किए जाने वाले कुल खर्च की कुल सीमा तय की जाती है.
जर्मनी: जर्मनी में राजनीतिक दलों को सार्वजनिक (सरकारी) धन से चुनावी फंडिंग दी जाती है, जो पिछले चुनावों में उनके प्रदर्शन पर आधारित होती है. इसके अलावा निजी चंदे पर कड़े रिपोर्टिंग नियम लागू हैं ताकि चुनावी निष्पक्षता बनी रहे.
अमेरिका जहां धन के प्रवाह को ‘स्वतंत्र अभिव्यक्ति’ का हिस्सा मानकर असीमित फंडिंग की इजाजत देता है, वहीं भारत में चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के लिए उम्मीदवारों के खर्च पर सीमा और चंदे की पारदर्शिता पर अधिक जोर दिया जाता है.



