यूजीसी के नए नियमों को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों में सवर्ण समाज से जुड़े कुछ संगठनों ने इन नियमों का विरोध भी जताया है। विरोध करने वाले एक वर्ग का कहना है कि इन नियमों के लागू होने से अनावश्यक परेशानियां बढ़ सकती हैं और झूठी शिकायतों की संख्या भी बढ़ेगी। साथ ही यह आशंका भी जताई जा रही है कि ओबीसी, एससी और एसटी छात्रों की शिकायतों की जांच करने वाली समितियों में सवर्ण प्रतिनिधियों को जगह नहीं मिलेगी। हालांकि, नियमों की वास्तविक व्यवस्था इससे अलग तस्वीर पेश करती है।

यूजीसी द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार शिकायतों की जांच के लिए हर संस्थान में समता समिति का गठन किया जाएगा। सभी प्रकार की शिकायतों की जांच यही समिति करेगी। समिति की संरचना ऐसी रखी गई है जिसमें विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व की संभावना बनी रहती है।

नियमों के तहत समता समिति के पदेन अध्यक्ष संस्थान के प्रमुख (जैसे डायरेक्टर या वाइस चांसलर) होंगे। समिति के सदस्यों का चयन भी उन्हीं के अधिकार क्षेत्र में होगा। यूजीसी ने यह भी तय किया है कि सभी संस्थानों में समान अवसर केंद्र स्थापित किए जाएं, जिनके अंतर्गत यह समिति कार्य करेगी। समिति का समन्वयक पदेन सचिव की भूमिका निभाएगा। इस पद के लिए किसी स्थायी प्रोफेसर या वरिष्ठ फैकल्टी सदस्य को चुना जाएगा, जिसकी सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के कल्याण में रुचि हो।

समिति में संस्थान प्रमुख के अलावा तीन प्रोफेसर या वरिष्ठ फैकल्टी सदस्य, एक गैर-शिक्षण कर्मचारी और समाज से पेशेवर अनुभव रखने वाले दो प्रतिनिधि शामिल किए जाएंगे। इसके अतिरिक्त दो छात्र प्रतिनिधि भी विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में समिति का हिस्सा होंगे।

यूजीसी के प्रावधानों के अनुसार समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिला और दिव्यांग वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। यानी 10 सदस्यीय समिति में से 5 सदस्य इन श्रेणियों से होंगे। बाकी 5 सदस्य किसी भी वर्ग या समुदाय से हो सकते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि सवर्ण वर्ग के प्रतिनिधियों को शामिल किए जाने की संभावना बनी रहती है।

महिला और दिव्यांग प्रतिनिधित्व के लिए भी किसी विशेष जाति या वर्ग की बाध्यता नहीं रखी गई है। अंतिम निर्णय समिति के अध्यक्ष के विवेक पर निर्भर करेगा कि किन व्यक्तियों को शामिल किया जाए। इस प्रकार विभिन्न सामाजिक समूहों के साथ-साथ सवर्ण समुदाय की भागीदारी भी संभव है।

समिति के नियमित सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित किया गया है, जबकि विशेष आमंत्रित सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष का होगा। समिति की कम से कम दो बैठकें हर वर्ष आयोजित की जाएंगी। कोरम के लिए, विशेष आमंत्रित सदस्यों को छोड़कर, कम से कम चार सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होगी।

अर्धवार्षिक बैठकों में बीते छह महीनों के मामलों और उनकी प्रगति की समीक्षा की जाएगी। अन्य समितियों को भेजे गए मामलों पर भी चर्चा होगी। यूजीसी नियमों के खंड 6 के तहत समता हेल्पलाइन का भी प्रावधान किया गया है, जो 24 घंटे संचालित रहेगी। कोई भी व्यक्ति कभी भी शिकायत दर्ज करा सकेगा और शिकायतकर्ता को अपनी पहचान गोपनीय रखने का अधिकार भी दिया गया है।

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