बिहार के मखाना की पिछले एक दशक में पूरी दुनिया में ‘सुपर फूड’ के रूप में पहचान बनी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई सार्वजनिक समारोहों मे कह चुके हैं कि वह सुबह के नाश्ते में मखाना खाते हैं। इसकी खेती और किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए मखाना बोर्ड की स्थापना को मंजूरी दी जा चुकी है। लेकिन बिहार की नई पीढ़ी मखाने का खेती से दूर हो रही है।

सरकार के स्तर पर मखाना की वैश्विक ब्रांडिग से भी इसकी पहुंच 55 से अधिक देशों तक हो चुकी है। पिछले साल केंद्र ने मखाना बोर्ड की मंजूरी दी। मांग बढ़ने से खेती का रकबा भी बढ़ा है। पर, इसकी खेती- उत्पादन के प्रति नई पीढ़ी का आकर्षण न केवल कम हो रहा है, बल्कि वह खुद को इससे अलग भी कर रही है। कुशल मजदूरों की कमी भी बड़ी समस्या है। यह मखाना उत्पादन के भविष्य की सबसे चिंता का विषय है।

मखाना उत्पादक जिलों की जमीनी पड़ताल में यह तथ्य उभरा कि पानी-कीचड़ भरे तालाब में घंटों खड़े रहना, गुड़ी को आग में भूनने और पीटकर मखाना बनाने की जटिल प्रक्रिया उत्पादकों की नई पीढ़ी को इससे दूर कर रही है। बिहार में मुख्य रूप से दस जिलों- मधुबनी, दरभंगा, सुपौल, सहरसा, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया, मधेपुरा और खगड़िया में करीब 40 हजार हेक्टेयर में खेती होती है।

बिहार में देश का 85% और दुनिया का 80% मखाना होता है। 12 वर्षों में रकबा तीन गुना और उत्पादन चार बढ़ा है। यहां से 20-22 हजार टन मखाना का सालाना निर्यात भी है। मधुबनी के किसान जामुन सहनी कहते हैं कि दूर से आकर्षक दिखने वाली इसकी खेती हकीकत में जोखिम भरी है। गुड़ी को भूनने, उसे पीटकर मखाना बनाने की प्रक्रिया में मजदूर झुलस जाते हैं। ठंड में घंटों तालाब में खड़ा रहने से चर्मरोग और संक्रमण होता है। ऐसे में नई पीढ़ी दूसरा काम करना ज्यादा मुनासिब समझती है।

पूर्णिया के विक्रम यादव कहते हैं कि पुराने कुशल मजदूरों की संख्या घट रही है। मजदूर पलायन कर रहे हैं। गुड़ी (बीज) को फोड़ लावा बनाने के लिए आई मशीनें कारगर नहीं हैं। पारंपरिक तरीका भी बेहद जोखिम भरा है।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *