कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में प्रशिक्षु महिला डॉक्टर से दरिंदगी की घटना 35 साल पहले इसी शहर में हुए बहुचर्चित हेतल पारेख हत्याकांड की याद दिलाती है। 

इन दोनों वारदातों में काफी समानताएं हैं। सबसे बड़ा मेल तो यह है कि इनमें कसूरवार वे लोग हैं, जिन पर दुष्कर्म व हत्या की शिकार लोगों की सुरक्षा का जिम्मा था, यानी रक्षक ही भक्षक बन गए। 

सुरक्षा की थी जिम्मेदारी

हेतल पारेख हत्याकांड में सूली पर चढ़ाया गया धनंजय चटर्जी कोलकाता के भवानीपुर इलाके की उसी आवासीय कॉम्प्लेक्स का सुरक्षाकर्मी था, जिसके तीसरे तल्ले पर स्थित फ्लैट में 14 वर्षीय छात्रा हेतल रहती थी।

वहीं आरजी कर कांड में आजीवन कारावास की सजा पाने वाले कोलकाता पुलिस के सिविक वालंटियर संजय रॉय पर भी उसी अस्पताल की सुरक्षा का जिम्मा था, जहां प्रशिक्षु महिला डॉक्टर काम करती थी। 

दोनों वारदातों के खिलाफ दिखा भारी जनाक्रोश

  • इन दोनों वारदातों ने नागरिक समाज को स्तब्ध कर दिया था। 5 मार्च, 1990 को हुए हेतल पारेख हत्याकांड के खिलाफ आरजी कर कांड जैसा ही भारी जनाक्रोश दिखा था। आरजी कर आंदोलन की अगुआई जहां डाक्टर समुदाय ने की, वहीं उस आंदोलन का नेतृत्व शिक्षक समुदाय ने किया था।
  • आरजी कर कांड को लेकर जहां वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सड़क पर उतरकर न्याय की मांग की, वहीं हेतल पारेख हत्याकांड के खिलाफ तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की पत्नी मीरा भट्टाचार्य ने न्याय की आवाज उठाई थी।

जांच को लेकर भी उठे सवाल

निचली अदालत ने आरजी कर कांड में संजय रॉय को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। मृतका के माता-पिता व आंदोलन करने वाले जूनियर डॉक्टर इस फैसले से खुश नहीं हैं। उनका मानना है कि इसके पीछे कई और लोगों का हाथ है।

उन्होंने पहले कोलकाता पुलिस व अब सीबीआई जांच पर सवाल उठाया है। इसी तरह हेतल पारेख हत्याकांड की पुलिस जांच पर भी सवाल उठे थे। कुछ का मानना था कि मामले की जांच में खामियां रह जाने के कारण ही धनंजय को फांसी पर चढ़ना पड़ा था। 

बेकसूर बताता रहा आरोपी

धनंजय सूली पर चढ़ाए जाने से पहले तक खुद को बेकसूर बताता रहा था। धनंजय को 14 अगस्त, 2004 को अलीपुर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी। गौर करने वाली बात यह है कि फांसी वाले दिन उसका 42वां जन्मदिन भी था। 

फांसी से पहले धनंजय ने करीब 14 साल जेल में बिताए थे। उसके मामले में निचली अदालत के फैसले को कलकत्ता हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उसकी दया याचिका खारिज कर दी थी। 

1990 में हुई थी घटना

मालूम हो कि 5 मार्च, 1990 को हेतल को उसके फ्लैट में मृत पाया गया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दुष्कर्म के बाद हत्या की पुष्टि हुई थी। वारदात वाले दिन हेतल के माता-पिता किसी काम से बाहर गए थे। जाने से पहले वे फ्लैट की चाबी धनंजय को देकर गए थे और बेटी के स्कूल से लौटने पर चाबी उसे दे देने को कहा था। 

9 अगस्त, 2024 को आरजी कर अस्पताल के सेमिनार हॉल से महिला डॉक्टर का शव मिलने के मामले में भी दुष्कर्म के बाद हत्या की पुष्टि हुई थी। वारदात के अगले दिन गिरफ्तार संजय भी अपने बेकसूर होने का दावा करता आया है। हालांकि अदालत में अपनी बात रखने का कई बार मौका दिए जाने पर भी वह खुद को निर्दोष साबित नहीं कर पाया।

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