Explained: नजमे अमीनी कौन हैं? ईरान में ईशनिंदा के आरोप में 23 वर्षीय छात्रा को मौत की सजा

अमिनी पर ईरानी कानून के तहत ‘सबोल-नबी’ (पैगंबर मुहम्मद या पवित्र हस्तियों का अपमान करने से जुड़ा अपराध) के तहत मुकदमा चलाया गया.

ओस्लो स्थित मानवाधिकार संगठन ‘ईरान ह्यूमन राइट्स’ के आंकड़ों के अनुसार, इस साल अब तक ईरान में कम से कम 600 लोगों को फांसी दी जा चुकी है. इन भयावह आंकड़ों के बीच, एक 23 वर्षीय ईरानी महिला को ईशनिंदा के आरोप में मौत की सजा सुनाए जाने का बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है.

उत्तर-पूर्वी ईरान के मशहद स्थित वकीलाबाद केंद्रीय जेल में बंद नजमेह अमिनी अकाउंटिंग की 23 वर्षीय छात्रा हैं. उन्हें इस वर्ष जनवरी में, देश भर में बिगड़ती आर्थिक स्थिति के खिलाफ चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किया गया था. ईरानी सरकार ने इन प्रदर्शनों पर सख्त रुख अपनाते हुए 50,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया था, जिनमें अमिनी भी शामिल थीं.

सोशल मीडिया पोस्ट और ‘सबोल-नबी’ का आरोप

गिरफ्तारी से पहले ही ईरान की साइबर पुलिस, जिसे ‘FATA’ कहा जाता है, अमिनी की ऑनलाइन गतिविधियों पर लगातार नज़र रख रही थी. अधिकारियों का आरोप है कि उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए शिया इस्लाम में अत्यंत पूजनीय ‘बारह अचूक इमामों’ के बारे में आपत्तिजनक और अश्लील टिप्पणियां की थीं.

अमिनी पर ईरानी कानून के तहत ‘सबोल-नबी’ (पैगंबर मुहम्मद या पवित्र हस्तियों का अपमान करने से जुड़ा अपराध) के तहत मुकदमा चलाया गया. 7 अक्टूबर को ‘खुरासान’ अखबार ने पुष्टि की कि खुरासान रज़ावी क्रिमिनल कोर्ट-1 की शाखा 6 ने अमिनी को मृत्युदंड की सजा सुनाई है.

अदालत में बचाव और अतिरिक्त सजाएं

अदालत की सुनवाई के दौरान अमिनी ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि उसने दोस्तों के साथ मतिभ्रम पैदा करने वाले मशरूम का सेवन किया था और उसी मतिभ्रम की स्थिति में बहककर उससे यह पोस्ट हुई. उसके वकील ने इसे ‘जुबान फिसलने’ का मामला बताया.

हालांकि, पीठ के जज ने इस तर्क को खारिज कर दिया. ईशनिंदा के तहत मिली मौत की सजा के अलावा, एक अलग मामले में अमिनी को राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ गतिविधियों और सरकार विरोधी दुष्प्रचार के आरोपों में 12 साल, 6 महीने और 1 दिन की अतिरिक्त जेल की सजा भी सुनाई गई है.

ईरान का ईशनिंदा कानून और मानवाधिकार संगठनों की चिंता

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान की कानूनी व्यवस्था पूरी तरह से शिया इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित है.

धारा 262 (इस्लामिक दंड संहिता): पैगंबर मुहम्मद, किसी ईश्वरीय पैगंबर, बारह इमामों या फातिमा ज़हरा का अपमान करने पर मृत्युदंड का प्रावधान है.

बचाव के कानूनी प्रावधान: कानून में यह भी उल्लेख है कि यदि कोई अपराध अनजाने में, नशे, गुस्से, दबाव या शब्दों का अर्थ समझे बिना हुआ हो, तो मौत की सजा से छूट मिल सकती है और अधिकतम 74 कोड़ों की सजा दी जा सकती है. इसके बावजूद अदालत ने अमिनी को यह राहत देने से इनकार कर दिया.

‘ईरान ह्यूमन राइट्स’ के निदेशक महमूद अमीरी-मोघद्दम ने इस फैसले पर गहरा दुख और चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण ऑनलाइन अभिव्यक्ति के लिए एक 23 वर्षीय महिला को मौत की सजा देना बेहद खतरनाक रुझान है. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तत्काल हस्तक्षेप करने और अमिनी की सजा को रद्द करवाने की अपील की है.

इस साल अबतक 600 लोगों को फांसी

ओस्लो स्थित मानवाधिकार संगठन ‘ईरान ह्यूमन राइट्स’ की हालिया रिपोर्ट ने वैश्विक समुदाय को झकझोर कर रख दिया है. रिपोर्ट के अनुसार, इस साल अब तक ईरान में कम से कम 600 लोगों को फांसी की सजा दी जा चुकी है. यह आंकड़ा न केवल भयावह है, बल्कि ईरान में न्याय प्रणाली के नाम पर हो रहे मानवाधिकारों के खुले उल्लंघन को भी उजागर करता है.

ईरान में मृत्युदंड का इस्तेमाल केवल गंभीर अपराधों के लिए ही नहीं, बल्कि सरकार विरोधी आवाज़ों को दबाने और नागरिकों में खौफ पैदा करने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है. हाल के दिनों में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में शामिल युवाओं, सोशल मीडिया पर अपने विचार व्यक्त करने वालों और ईशनिंदा के मनगढ़ंत आरोपों का सामना कर रहे लोगों को फांसी पर लटकाया गया है.

अदालती कार्यवाही में पारदर्शिता की भारी कमी है. अक्सर आरोपियों को उचित कानूनी परामर्श और बचाव का अवसर दिए बिना ही जल्दबाज़ी में सजा सुना दी जाती है. मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने तेहरान प्रशासन से मृत्युदंड पर तुरंत रोक लगाने और निष्पक्ष न्यायिक समीक्षा की मांग की है. हालांकि, कड़े अंतरराष्ट्रीय रुख के अभाव में ईरान में फांसी का यह सिलसिला लगातार गहराते मानवीय संकट का रूप ले चुका है.

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