श्रीराधाकृष्ण धाम वृंदावन की धरती थी और वहां पहुंचे थे 50 साल की उम्र पार कर चुके 30 से ज्यादा नटखट और मनमौजी बच्चे। हां बच्चे ही कहेंगे। क्योंकि मन से हम सभी 1990 के उसी दशक में चले गए थे, जब हम लोग इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र थे। इस समागम में दो आईपीएस थे, दर्जन भर पीसीएएस थे, हाईकोर्ट के वकील थे, उद्यमी थे, लेकिन यहां सभी किशोर थे, किशोरों वाली हरकतें कर रहे थे। हंसी-ठिठोली चल रही थी, छेड़छाड़ हो रही थी, चुटकियां ली जा रही थीं, बतरस लिया जा रहा था, कविताएं पढ़ी जा रही थीं, गाने गाए जा रहे थे, कदम भी थिरक रहे थे।
यह समागम था इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में 1992 में एमए किए हुए बैच का। मैंने संस्कृत में एमए किया था, लेकिन मेरी और दीपशिखा की एंट्री वाइल्ड कार्ड से हुई। दरअसल इस ग्रुप में कई ऐसे साथी थे, जिनका बीए में संस्कृत था, तो हम दोनों उस कोटे से आ गए, क्योंकि संयुक्त रूप से सबसे मित्रता थी।
तीन दिन का ये वाला समागम तो भव्य और दिव्य रहा। पहले दिन यानी शनिवार को सबसे पहले हम लोग प्रेम मंदिर दर्शन करने गए। वहां राधा-कृष्ण के निर्बाध और दिव्य रूप से दर्शन हुए। भीड़ के बावजूद आसानी से दर्शन हुए तो इसमें हमारे आईपीएस भाई रामसुरेश जी का परम प्रताप भी शामिल था। मंदिर के परिसर में हम लोग पालथी मारकर बैठ गए और थ्रीडी लाइटिंग शो देखा, जिसमें फव्वारों की धारा के बीच कृपालु जी महाराज भजन गाते दिख रहे थे।
प्रेम मंदिर के बाद हम लोग गए चंद्रोदय मंदिर। अभी यह मंदिर निर्माणाधीन है, लेकिन जो योजना है, उसके मुताबिक यह देश ही नहीं दुनिया का सबसे बड़ा और अद्भुत मंदिर बनने वाला है। यहां श्रीराधेकृष्ण की मूर्ति इतनी सुंदर है कि वहां से नजरें हटाने का जी नहीं करेगा। मंदिर में 5 स्टार मॉल जैसी सुविधाएं हैं, मार्केट है, शानदार रेस्टोरेंट भी है। बिना लहसुन-प्याज का जो खाना हम लोगों ने वहां खाया, उसका स्वाद अभी भी जीभ पर ताजा है।
दूसरा दिन रविवार था, भीड़ गजब की थी और हमें बांके बिहारी जी के दर्शन करने थे। सुबह ही हमारे बैच की लड़कियों और हम पुरुष सदस्यों की पत्नियों ने भजन मंडली बना ली। होटल में ही श्रीकृष्ण भजन का दौर चल पड़ा। भजन चले तो नृत्य भी हुआ। श्री बांके बिहारी महाराज संभवतः प्रेम और श्रद्धा में डूबी इन महिलाओं को और दर्शन के लिए लालायित हम सभी को देख रहे थे। तभी तो इतनी भीड़ में उनकी कृपा बरसी और हम लोगों ने बहुत ही बढ़िया तरीके से उनके दर्शन किए। कुछ साथी निधि वन भी गए।
रविवार शाम को दोस्तों की रंगारंग महफिल सजी। बांसुरी वादन से शुरुआत हुई। फिर हमारे साथियों ने समां बांध दिया। मित्र राघवेंद्र सिंह ने भजन सुनाया तो स्त्री और पुरुष दोनों की आवाज में गीत सुनाकर हम सभी को अचंभित कर दिया। राकेश सिंह ने माइक पकड़ा तो माइक के लाल बन गए। उन्होंने दो पारियां खेलीं। पहली पारी में गजल सुनाई, जिस पर खूब तालियां बजीं। मनुलक्ष्मी मिश्रा ने भावपूर्ण कविता सुनाई, दोहे भी पढ़े।
वृंदावन की धरती थी तो रासलीला के बिना रस अधूरा था। वहां की मंडली उपस्थित थी। राधा कृष्ण और गोपिकाओं ने गजब की नृत्य प्रस्तुति दी। एक प्रसंग आया कि श्रीकृष्ण यशोदा मइया से जिद कर रहे हैं कि वे राधा के साथ उनका ब्याह करवा दें। गाना था- राधिका गोरी से बिरज की छोरी से..मैया करादे मेरो ब्याह। गाने की इस लीला में मनुलक्ष्मी यशोदा की भूमिका में आईं। क्या गजब की प्रस्तुति दी। मनु की अदायगी देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वह इस मंडली की पात्र नहीं है। मनु ने कान्हा के कान भी उमेठे और इन पंक्तियों पर मटककर अद्भुत अभिनय किया- उमर तेरी छोटी है, नजर तेरी खोटी है, कैसे करा दूं तेरा ब्याह।
रामसुरेश भाई ने माइक पकड़ा तो कमाल ही कर दिया। भावनाओं में पगी पंक्तियां बता रही थीं कि इस पुलिस अफसर के भीतर अभी भी एक कवि, एक शायर धड़कता है। राम सुरेश भाई की सुरक्षा व्यवस्था में पुलिस की पूरी टीम थी, रात में जैसे ही टीम हटी, रामसुरेश भाई आजाद हो गए। फिर तो काले कुर्ते और धोती में उन्होंने गजब के ठुमके भी लगाए।
भाई कमलाकांत जी की गायकी 90 के दशक में पूरे विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध थी। मेज को तबला बनाकर जब वह तान छेड़ते थे तो समां बंध जाता था। इस बार मेज बजाने का जिम्मा लिया अरुण उपाध्याय भाई ने। कमलाकांत ने तान छेड़ी- कुइयां का ठंडा पानी, पीपल की छांव रे, अइहा परदेसिया सवेरे मोरे गांव रे। इसके बाद उन्होंने सुनाया- तौबा ये मतवाली चाल…। क्या सुर था, क्या लय था, क्या तान थी। मजाल थी कि जो एक भी सुर कहीं भटका हो। नमन है उनकी गायकी को। इसके बाद रंजना जी ने भजन और गजल सुनाया। छोटे-छोटे दो बच्चों ‘वत्स बंधु’ ने बिना साज के ‘ऐसी लागी लगन’ भजन सुनाया तो सभी भक्ति के आनंद सागर में पहुंच गए।
भोजन के बाद रात 11 बजे के आसपास महफिल की दूसरी पारी शुरू हुई। राकेश भाई ने एक बार फिर माइक संभाला। प्यार के दर्द और कसक में डूबी एक लंबी गजल सुनाई। इसके बाद कर्ण वध के प्रसंग में सूर्य-कृष्ण संवाद पर अपनी रचना सुनाई। 40 मिनट तक यह रचना चलती रही। पूर्ण विराम आ ही नहीं रहा था। मनु और दीपशिखा के कमरे में हमारा कुछ सामान रखा था, हम उसे लेने चले गए। होटल में कमरा दूसरी मंजिल पर था और एक कमरे में गाना चल रहा था- नाम जलेबी बाई। हमने झांककर देखा तो बच्चे स्पीकर पर यह गाना बजाकर डांस कर रहे थे। हमने इजाजत मांगी और भीतर आकर उनका यह उत्सव देखा। यानी जेनजी वाले बच्चे अपनी महफिल सजाए बैठे थे। उसमें भी रंग कम नहीं थे।
महफिल में कुछ हास्य, कुछ करुण और कुछ वात्सल्य रस के प्रसंग भी आए। मित्र गोरखनाथ भट्ट जी का बेटा थोड़ा ‘स्पेशल चाइल्ड’ है, लेकिन है गजब का जीनियस। प्रेजेंस ऑफ माइंड तो गजब का है उसमें। जब राकेश भाई दर्द भरी गजल सुना रहे थे, तब उसने कहा- अंकल, लगता है कि यूनिवर्सिटी टाइम में सबसे ज्यादा दिल आपका ही टूटा था। यह सुनते ही ठहाका गूंज उठा। लोगों ने कहा- बेटा सही बोले।
जब गोरखनाथ जी मंच पर पहुंचे, अपनी प्रस्तुति दी और उनकी कविता में प्रेम रस उमड़ा तो बेटे ने पूछा-पापा ये बताइए, क्लास में वो कौन सी लड़की थी, जिसे आप चाहते थे। गोरखनाथ जी फंस गए, लेकिन अनुभव और दर्शनशास्त्र की पढ़ाई के दम पर बात घुमाई। बेटे ने कहा- पापा समझ में नहीं आया, सीधे-सीधे बताओ। इधर ठहाके गूंज रहे थे, गोरखनाथ जी की इज्जत संभाली अरुण भाई ने। उन्होंने कहा- बेटा तुम्हारे पापा को जो पसंद थी, उससे कभी कह नहीं पाये और वो आज यहां उपस्थित भी नहीं है। उस बच्चे ने कार्यक्रम के बीच में कहा- अंकल मैं कुछ कहना चाहता हूं। उसे माइक दिया गया। उसने कहा- मैं अपने मम्मी-पापा को थैंक्स कहना चाहता हूं, जिन्होंने अपनी जिंदगी में न जाने कितने सेक्रीफाइस मेरी वजह से किए। मेरी जैसे बच्चे घरों में नहीं, ज्यादातर अनाथालय में पाये जाते हैं। उसकी यह बात सुनकर उसकी मां मृदुला भाभी के आंसू बह निकले। हम में से कोई भी ऐसा नहीं था, जिसके आंसू न छलके हों।

इस आयोजन में सहपाठियों में शामिल पुरुष अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आए थे तो सहपाठिनें अपने पतियों और बच्चों के साथ आई थीं। करीब 90 लोगों का यह एक पारिवारिक मिलन था, जहां महिलाओं की आपस में अच्छी केमेस्ट्री बन गई। कुछ साथियों की पत्नियों से पहली बार मुलाकात हुई और मन में विश्वास हुआ कि पूर्व जन्म में जरूर 16 सोमवार का व्रत इन्होंने रखा होगा, तभी ऐसी जीवन संगिनियां मिलीं। मैं बात सिर्फ अरुण भाई, अनिल सिंह और त्रिभुवन भाई की ही नहीं कर रहा हूं। कई साथियों के बारे में यह बात खरी उतरती है।
इस आयोजन के मुख्य संयोजक मित्र अरुण उपाध्याय, रमेश भाई और रामसुरेश भाई रहे। क्या प्रबंधन था, क्या व्यवस्था थी। अरुण भाई को देखकर कई बार लगा कि जैसे उनकी बेटी का विवाह हो और वह समधी बने बारात का स्वागत कर रहे हों। आप तीनों भाइयों ने इस घोर कलियुग में वो कर दिया, जो सतयुग में भी मुश्किल था। आप सभी के लिए धन्यवाद और आभार शब्द बहुत छोटा है। इतने लोगों का जमावड़ा आसान बात नहीं थी। शौक भी इतना कि हर साथी के पहुंचने पर उसे विश्वविद्यालय के नाम और लोगो से युक्त पट्टा पहनाया गया। महिलाओं के लिए दुपट्टे की व्यवस्था थी। रविवार रात हर साथी के सिर पर साफा बंधा हुआ था। इस कार्यक्रम में मित्रों के लेख और कविताओं से युक्त एक पत्रिका भी प्रकाशित की गई, जिसका विमोचन बच्चों के हाथों करवाया गया।
1990 के दशक में पढ़ाई करके निकले साथियों को एक सूत्र में पिरोने की सूत्रधार थीं नीलू अग्रवाल और संगीता श्रीवास्तव। 2018 में नीलू और संगीता ने एक-एक करके लोगों को व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उसमें जोड़ना शुरू किया। जो अब एक बड़ा कुनबा हो गया है। हालांकि अब संगीता हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन कार्यक्रम में उनकी स्मृति रूप में मौजूदगी हर तरफ रही।
इस आयोजन के बहाने अनीता, अजित जी, अनिल सिंह, अनिल जायसवाल, अश्विनी जी, मंशाराम जी, केपी सिंह, निभा जी, पूनम ओझा, त्रिभुवन जी समेत तमाम पुराने साथियों से भेंट बहुत सुखद रही। साथियों के तब और अब के लुक में फर्क भी आया है। धर्मेंद्र भाई के बाल साफ हो गए, थोड़ी तोंद निकल आई है। रमा माया, प्रियंका, राघवेंद्र, अजय सिंह और रामसुरेश भाई को छोड़ दें तो करीब-करीब सबकी काया का विस्तार हुआ है। हां दीपशिखा ने 21 किलो वजन कम किया है। हम सबमें जो भी फर्क आया है वह शारीरिक है, मानसिक तौर पर हम वहीं हैं, जहां 3 दशक पहले थे। इस आयोजन के बहाने तीन दिन में हम 34 साल पुरानी यादों को जी लिए। एक बार फिर अरुण भाई, राम सुरेश भाई और रमेश जी को दिल से बहुत बहुत धन्यवाद और ढेर सारा प्यार।
