अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के दो साल बाद चंदे में कथित अनियमितताओं का मुद्दा एक बड़े विवाद में तब्दील हो गया है। उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार द्वारा जांच के आदेश देने और एफआईआर दर्ज होने के बाद अब तक 8 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। आइए जानते हैं कि समाजवादी पार्टी के एक नेता के आरोप से शुरू हुआ यह मामला इतनी बड़ी कार्रवाई तक कैसे पहुंचा।

इस पूरे विवाद की शुरुआत 7 जून को हुई थी। समाजवादी पार्टी के नेता पवन पांडेय ने आरोप लगाया कि राम मंदिर के चढ़ावे से 5 करोड़ से लेकर 7.5 करोड़ रुपये तक का गबन किया गया है।

हालांकि, उसी दिन श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। चंपत राय ने दावा किया कि भक्तों द्वारा दान किए गए एक-एक रुपये का पूरा हिसाब रखा गया है और उसका ऑडिट हुआ है।

आरोपों के तुरंत बाद इस मुद्दे ने राजनीतिक तूल पकड़ लिया। 7 जून को ही सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आस्था में पारदर्शिता का हवाला देते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की।

यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय और आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने भी इसे दलगत राजनीति के बजाय जनता के भरोसे का मुद्दा बताते हुए जवाबदेही की मांग की। 25 जून को संजय सिंह अपने सबूत पेश करने के लिए एसआईटी (SIT) के सामने भी पेश हुए।

12 जून को अयोध्या के बीजेपी नेता रजनीश सिंह ने मामले में सीबीआई जांच की मांग करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा। इसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने भी 23 जून को एक आधिकारिक पत्र के जरिए मंदिर ट्रस्ट से तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की।

25 जून को विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने चोरी साबित होने पर एफआईआर दर्ज करने और मामले में शामिल सभी लोगों की जांच की मांग उठाई।

मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद मोर्चा संभाला। 19 जून को सीएम योगी ने स्पष्ट तौर पर कहा कि “किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।”

इससे पहले 13 जून को ही सीएम के आदेश पर तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया जा चुका था। इस टीम में लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी किरण एस. और विशेष सचिव (वित्त) नील रतन शामिल थे।

15 से 20 जून के बीच एसआईटी ने मामले की गहन पड़ताल की। जांच टीम ने ट्रस्ट के अधिकारियों, प्रशासकों, आउटसोर्स कर्मचारियों, सुरक्षाकर्मियों, कैश गिनने वाले कर्मचारियों और चंदा संभालने वाले भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के अधिकारियों से कड़ी पूछताछ की। टीम ने भर्ती प्रक्रियाओं, सीसीटीवी सिस्टम, कीमती सामानों की आवाजाही और नकदी, सोना-चांदी के चढ़ावे से जुड़ी अकाउंटिंग की बारीकी से जांच की।

करीब 150 लोगों की पहचान जांच के लिए की गई, जिनमें से लगभग दो दर्जन लोगों से विस्तृत पूछताछ हुई। जांच के दौरान नकदी और कीमती धातुओं की रिकवरी भी की गई। गुरुवार को दर्ज की गई एफआईआर के मुताबिक, एसआईटी ने पाया कि करीब 45 दिनों का सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध है।

23 जून को एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी। इसमें आपराधिक मामला दर्ज करने की सलाह दी गई और चंदा प्रबंधन के ढांचे में सुधार का सुझाव दिया गया। इसके बाद 25 जून को मंदिर ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसी शिकायत के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

साल 2021 में भी विपक्षी दलों ने मंदिर के आसपास अधिग्रहित जमीन के सौदों पर सवाल उठाए थे। हालांकि, तब वह विवाद केवल राजनीतिक आरोपों और खंडन तक ही सीमित रहा था। लेकिन मौजूदा चंदा विवाद में खुद सरकार ने जांच बिठाई, एफआईआर हुई, गिरफ्तारियां हुईं और जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

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