उच्च शिक्षा किसी भी लोकतांत्रिक समाज का नैतिक आधार होती है। यहाँ समान अवसर, योग्यता और परिश्रम को सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए। ऐसे में जनवरी 2026 से लागू UGC का “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations” अपने उद्देश्य में भले ही समावेशी दिखाई देता हो, लेकिन इसके कुछ प्रावधान छात्रों और शिक्षकों के मन में गहरी असुरक्षा और मानसिक दबाव पैदा कर रहे हैं।
इस कानून की सबसे बड़ी कमी इसकी अस्पष्ट भाषा है। Implicit discrimination जैसे शब्द इतने व्यापक हैं कि किसी भी शैक्षणिक निर्णय या सामान्य संवाद को आरोप के दायरे में लाया जा सकता है। जब तक यह स्पष्ट नहीं होता कि भेदभाव सिद्ध करने के मानदंड क्या होंगे और प्रमाण का भार किस पर होगा, तब न्याय की भावना मजबूत नहीं होती और भय का वातावरण बन जाता है।
इस बिल की दूसरी गंभीर समस्या झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान का अभाव है। शिकायत तंत्र को सशक्त बनाना आवश्यक है, लेकिन यदि गलत शिकायत की जवाबदेही तय न हो, तो वही तंत्र निर्दोष लोगों के लिए मानसिक दबाव और असुरक्षा का कारण बन सकता है।
छात्र और शिक्षक दोनों इस बिल की अस्पष्ट परिभाषा और झूठी शिकायतों पर स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान के अभाव के कारण खुद को असुरक्षित और भयभीत महसूस कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि कोई भी सामान्य संवाद, निर्णय या टिप्पणी ‘भेदभाव’ के दायरे में आ सकती है, जिससे हर कदम पर सतर्क रहने और गलती हो जाने पर दंडात्मक कार्यवाही होने का भय उत्पन्न हो गया है। इस भय के चलते शिक्षा और कक्षा का वातावरण दबावपूर्ण और असुरक्षित बन सकता है, जो किसी भी उच्च शिक्षा संस्थान के लिए अनुकूल नहीं है।
छात्रों और शिक्षकों में भय उत्पन्न करने वाले मुख्य प्रावधान:
1.Implicit discrimination की व्यापक और अस्पष्ट परिभाषा।
2.Equity Committees / Equity Squads का गठन।
3.झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत पर कोई स्पष्ट दंड न होना।
4.सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की अनिवार्यता का अभाव।
5.संस्थान पर प्रशासनिक दबाव।
6.शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई का प्रावधान।
इस पूरी बहस में यह महत्वपूर्ण प्रश्न अनदेखा रह जाता है कि सामान्य वर्ग के छात्रों को किस प्रकार की मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ सकती है। अब तक सामाजिक न्याय से जुड़े अनेक कानूनों का एक अनचाहा प्रभाव यह भी रहा है कि सामान्य वर्ग को स्वाभाविक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त मान लिया जाता है, जबकि वास्तविक जीवन में संघर्ष और अभाव जाति देखकर नहीं आते।
समानता का अर्थ यह नहीं कि एक वर्ग को सुरक्षा देकर दूसरे वर्ग की पीड़ा को अनदेखा कर दिया जाए। समानता का वास्तविक अर्थ न्यायपूर्ण संतुलन है; ऐसा संतुलन जिसमें हर छात्र स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और आश्वस्त महसूस करे; न कि अपनी सामाजिक श्रेणी को ही एक बोझ समझने लगे।
अतः सरकार से निवेदन है कि शिक्षा से जुड़े इस कानून के प्रावधानों पर पुनर्विचार किया जाए, ताकि समानता की भावना व्यवहारिक न्याय के साथ जुड़ सके और शिक्षा व्यवस्था वास्तव में सभी विद्यार्थियों के लिए विश्वास का आधार बन सके।
धन्यवाद,
लक्ष्मी दुबे
स्वतंत्र लेखिका
मुंबई, महाराष्ट्र

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