केंद्र सरकार ने यमुना नदी के पर्यावरणीय बहाव (ई-फ्लो) की सही निगरानी के लिए बड़ा कदम उठाया है। हथनीकुंड और ओखला बैराज के पास दो आधुनिक मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित किए जाएंगे। ये स्टेशन नदी के पानी के बहाव और गुणवत्ता पर रीयल-टाइम नजर रखेंगे, ताकि यमुना को फिर से जीवंत बनाने की दिशा में सही फैसले लिए जा सकें।

यमुना दिल्ली में बेहद प्रदूषित हो चुकी है। यहां नदी को न्यूनतम ई-फ्लो के लिए करीब 23 क्यूमेक्स पानी की जरूरत है, लेकिन वर्तमान में सिर्फ 10 क्यूमेक्स ही मिल पाता है। विशेषज्ञों और संसदीय समिति की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 23 क्यूमेक्स बहाव से नदी में प्रदूषण कम होगा, झाग जैसी समस्या घटेगी और कुछ जलीय जीव फिर से जीवित रह सकेंगे।

ये नए स्टेशन इसी कमी को दूर करने में मदद करेंगे। इनसे नदी के विभिन्न पैरामीटर्स जैसे बहाव, पानी की गुणवत्ता आदि की लगातार निगरानी होगी। इससे हरियाणा और दिल्ली के बीच पानी छोड़ने को लेकर होने वाले विवादों का भी पारदर्शी समाधान संभव होगा।

नमामि गंगे मिशन के तहत नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) ने इस प्रोजेक्ट को प्रशासनिक मंजूरी दे दी है। कुल 1.56 करोड़ रुपये का खर्च आएगा, जिसमें से लगभग 1 करोड़ रुपये उपकरणों पर और बाकी इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगेंगे। ये दोनों स्टेशन अगले छह महीनों में तैयार हो जाएंगे और सितंबर 2026 तक पूरी तरह चालू हो जाएंगे। ये स्टेशन NMCG के ई-फ्लो मॉनिटरिंग सेंटर से जुड़े होंगे, जो डिजिटल तरीके से नदी की स्थिति ट्रैक करेगा।

यमुना यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलती है और 1,376 किलोमीटर की यात्रा के बाद प्रयागराज में गंगा से मिलती है। लेकिन दिल्ली पहुंचते-पहुंचते बैराजों से पानी नहरों में डायवर्ट हो जाता है। गर्मियों में तो मूल मात्रा का सिर्फ 10% पानी ही बच पाता है और वह भी ज्यादातर सीवेज से भरा होता है। वजीराबाद से ओखला के 22 किलोमीटर के हिस्से में ही नदी का 76% से ज्यादा प्रदूषण जुड़ जाता है। हथनीकुंड बैराज पानी छोड़ने का मुख्य केंद्र है, लेकिन यहां से कितना पानी दिल्ली पहुंच रहा है, इस पर अक्सर विवाद होता है।

दिल्ली सरकार भी ई-फ्लो बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चला रही है। इसमें वजीराबाद और ओखला के नीचे ज्यादा ट्रीटेड पानी छोड़ना, गंगा से कुछ पानी यमुना में डायवर्ट करना और 1994 के पानी बंटवारे समझौते की दोबारा समीक्षा शामिल है।

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