कांग्रेस, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को लेकर भले ही हो-हल्ला मचा रही हो लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यह योजना किस तरीके से भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई थी। करीब दो दशक पहले लागू हुई इस योजना ने ग्रामीण परिवारों को रोजगार और आजीविका की कानूनी गारंटी दी, लेकिन समय के साथ इसके क्रियान्वयन में कई ऐसी स्थायी और गहरी खामियां सामने आईं, जिनसे योजना की कार्यक्षमता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता प्रभावित हुई है।
25 राज्यों के 55 जिलों में भ्रष्टाचार का खुलासा
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक जमीनी हालात के सही आकलन और व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से वर्ष 2025–26 में 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 55 जिलों में विशेष निगरानी दौरे किए गए। इस दौरान एक हजार से अधिक कार्यस्थलों की जांच की गई। जांच में कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। इनमें ऐसे काम शामिल थे, जो कागजों में तो दिखाए गए लेकिन जमीन पर मौजूद नहीं थे। कई जगह नियमों के खिलाफ काम कराए गए, वित्तीय गड़बड़ियां हुईं, धन का गलत इस्तेमाल किया गया और कामों को छोटे हिस्सों में बांटकर निचले स्तर से मंजूरी ली गई। कई मामलों में ठेकेदारों या तीसरे पक्ष के जरिए काम कराया गया, जबकि अधिनियम में ठेकेदारों की स्पष्ट मनाही है। खरीद प्रक्रियाएं भी कमजोर पाई गईं, जहां एक ही सप्लायर या एक ही टेंडर की स्थिति आम होती जा रही है, जिससे पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है। कई फाइलों में रॉयल्टी भुगतान और जीएसटी से जुड़े दस्तावेज भी नहीं मिले, जो वित्तीय नियंत्रण की कमजोरी और संभावित धन-रिसाव की ओर इशारा करते हैं।
फेक जॉब कार्ड और मस्टर रोल
इन खामियों के साथ-साथ शासन और निगरानी से जुड़ी कमियां भी सामने आईं। कई जगह फर्जी और निष्क्रिय जॉब कार्ड, बढ़ा-चढ़ाकर बनाई गई मस्टर रोल, अधूरे और खराब गुणवत्ता के काम तथा स्थानीय जरूरतों से मेल न खाने वाली परिसंपत्तियां पाई गईं। इन कमियों का कुल असर यह रहा कि एक ओर सार्वजनिक धन का दुरुपयोग हुआ और दूसरी ओर योजना का परिसंपत्ति निर्माण का उद्देश्य कमजोर पड़ा। मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी सलाह, प्रशिक्षण और सुधारात्मक निर्देशों से कुछ समस्याएं जरूर सुलझीं, लेकिन गड़बड़ियों का लगातार बने रहना बताता है कि यह समस्या अस्थायी नहीं बल्कि व्यवस्था से जुड़ी है।
भ्रष्टाचार के 11 लाख से ज्यादा मामले
सामाजिक अंकेक्षण, जो समुदाय आधारित निगरानी का एक माध्यम है, उसमें भी बड़े पैमाने पर अनियमितताएं उजागर हुईं। कुल 11,04,627 मामलों में वित्तीय गड़बड़ी की बात सामने आई, जिनमें लगभग 302.45 करोड़ रुपये की वसूली होनी थी। हालांकि, अब तक केवल 293.47 करोड़ रुपये की ही वसूली हो सकी।
आंतरिक ऑडिट की रिपोर्ट भी इन्हीं चिंताओं को मजबूत करती है। 1 दिसंबर 2025 तक सीसीए डिवीजन के आंतरिक ऑडिट से जुड़े 1,512 ऑडिट लंबित थे। इनमें से 145 मामले सीधे वित्तीय गड़बड़ियों से जुड़े हैं, जिनमें धन का दुरुपयोग, बिना आधार के भुगतान, कामों की गलत मंजूरी और क्रियान्वयन, गैर-मान्य कार्यों पर खर्च तथा खातों में गड़बड़ी शामिल है। इन मामलों में अनुमानित वित्तीय प्रभाव करीब 278.32 करोड़ रुपये का है, जो वित्तीय अनुशासन और जवाबदेही की गंभीर कमी को दर्शाता है।
बंगाल में सारे नियम रख दिए गए ताक पर
कुछ राज्यों में ये अनियमितताएं खास तौर पर गंभीर पाई गईं। पश्चिम बंगाल में हुई जांच में जमीन पर मौजूद न होने वाले काम, नियमों के खिलाफ गतिविधियां, वित्तीय हेराफेरी और जांच से बचने के लिए कामों का कृत्रिम विभाजन सामने आया। राज्य सरकार द्वारा प्रभावी सुधारात्मक कार्रवाई न किए जाने के कारण केंद्र सरकार को अस्थायी रूप से फंड जारी करना रोकना पड़ा, जिससे राज्य स्तर पर निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही की कमी उजागर हुई।
भ्रष्टाचार से जुड़ी इन बातों के अलावा कुछ व्यापक ढांचागत कमजोरियां भी सामने आईं। आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत राज्यों में, जहां ग्रामीण गरीबी कम है, वहां मनरेगा फंड का उपयोग ज्यादा हो रहा है। इसके उलट, ज्यादा गरीब राज्यों में उपलब्ध धन का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है, जिससे असमानता पैदा हो रही है। समय के साथ कई राज्यों में योजना की मांग-आधारित प्रकृति कमजोर हुई है और यह लक्ष्य-आधारित बन गई है, जहां ग्राम सभा की प्राथमिकताओं की बजाय लक्ष्य पूरे करने के लिए काम चुने जाते हैं। इससे समुदाय की भागीदारी और “काम मांगने का अधिकार” कमजोर पड़ा है।
80 साल तक की बुजुर्गों को कागज पर दिया था काम
एक और उभरता हुआ रुझान बुजुर्ग श्रमिकों की अधिक भागीदारी से जुड़ा है। कई जगह 60 साल से अधिक, यहां तक कि 80 साल से ऊपर के लोग भी काम करते पाए गए, जिससे उत्पादकता और परिसंपत्तियों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। चूंकि मजदूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती है, इसलिए कई राज्य सामग्री पर कम खर्च करते हैं और ज्यादा मजदूर-आधारित कामों को प्राथमिकता देते हैं। नतीजतन तकनीकी रूप से कमजोर और कम समय तक टिकने वाली परिसंपत्तियां बनती हैं। कुल खर्च का लगभग 90 प्रतिशत केंद्र द्वारा वहन किए जाने से राज्यों की भागीदारी, निगरानी और वित्तीय अनुशासन भी कमजोर पड़ा है।
‘विकसित भारत-जी राम जी’ में भ्रष्टाचार पर नकेल का प्रावधान
कुल मिलाकर, ये सभी बातें साफ तौर पर बताती हैं कि योजना की सामाजिक उपयोगिता के बावजूद पारदर्शिता, निगरानी, वित्तीय प्रबंधन, शासन और जवाबदेही में कमजोरियां अब व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी हैं। इन्हीं कारणों से ग्रामीण रोजगार के ढांचे में सुधार की आवश्यकता महसूस की गई, ताकि आजीविका सुरक्षा को मजबूत किया जा सके, शासन व्यवस्था सुधरे और बेहतर गुणवत्ता की परिसंपत्तियां बनाई जा सकें। साथ ही, ग्रामीण विकास को ‘विकसित भारत’ के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ना भी जरूरी था।
इसी संदर्भ में विकसित भारत—गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) [VB-G RAM G] अधिनियम, 2025 लागू किया गया है। इसका उद्देश्य इन प्रणालीगत कमियों को दूर करना, जवाबदेही बहाल करना और यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक धन वास्तव में टिकाऊ आजीविका और गुणवत्तापूर्ण ग्रामीण ढांचे के निर्माण में लगे।
