Explained: भारत में तेजी से बढ़ती मेडिकल महंगाई, क्या हेल्थ इंश्योरेंस सिस्टम नाकाफी साबित हो रहा है?

सरकार और स्वास्थ्य नियामकों को निजी अस्पतालों में इलाज और दवाओं की दरों के लिए एक पारदर्शी ढांचा तैयार करना चाहिए, ताकि मनमाने बिलों पर लगाम लगाई जा सके.

भारत में स्वास्थ्य सेवाएं लगातार महंगी होती जा रही हैं. हालिया आंकड़ों और रिपोर्टों के मुताबिक, देश में अस्पताल में भर्ती होने और इलाज का खर्च औसतन 14% से 15% सालाना की दर से बढ़ रहा है. यह दर देश की सामान्य खुदरा महंगाई दर से लगभग दोगुनी है. जब आम आदमी की आय की तुलना में इलाज का खर्च इस रफ़्तार से बढ़े, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर मेडिकल इंफ्लेशन इतनी बेकाबू क्यों है और क्या हमारा हेल्थ इंश्योरेंस सिस्टम इस दबाव को संभालने में नाकाम हो रहा है?

मेडिकल इंफ्लेशन इतनी तेज क्यों है? 

आम उपभोक्ता वस्तुओं जैसे आटा, दाल या कपड़े के मुकाबले स्वास्थ्य सेवाओं की महंगाई के पीछे कई जटिल और गहरे कारण हैं.

अत्याधुनिक तकनीक और महंगे मेडिकल उपकरण: मेडिकल साइंस और टेक्नोलॉजी में तेजी से प्रगति हो रही है. रोबोटिक सर्जरी, उन्नत एमआरआई मशीनें, कैंसर के इलाज में काम आने वाली टार्गेटेड थेरेपी और आधुनिक इम्प्लांट्स अत्यधिक महंगे होते हैं. अस्पताल इन तकनीकों को खरीदने में भारी निवेश करते हैं, और इसका वित्तीय बोझ अंततः मरीजों की जेब पर ही पड़ता है.

कॉरपोरेट अस्पतालों का वर्चस्व: भारत में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा अब कॉरपोरेट घरानों के हाथों में है. मल्टी-स्पेशलिटी और सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे और फाइव-स्टार जैसी सुविधाओं के साथ काम करते हैं. इन अस्पतालों का संचालन खर्च  बहुत अधिक होता है, जिसके कारण इलाज के बिल आसमान छूने लगते हैं.

दवाओं की बढ़ती कीमतें: इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाली दवाएं, सर्जिकल कंज्यूमेबल्स (जैसे पीपीई किट, सिरिंज, बैंडेज आदि) और जीवन रक्षक इंजेक्शनों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. हालांकि सरकार ने कई जरूरी दवाओं के दाम नियंत्रित किए हैं, फिर भी निजी अस्पतालों के बिलों में इन सामग्रियों के भारी-भरकम दाम जोड़े जाते हैं.

बीमा का कम दायरा और ‘कैशलेस’ का दुरुपयोग: भारत में एक बड़ी आबादी के पास पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा नहीं है. इसके अलावा, जिन लोगों के पास बीमा है, वहां अक्सर ‘मोरल हैज़र्ड’ की स्थिति देखी जाती है. यानी बीमा होने पर अस्पताल अक्सर अनावश्यक जांचें और महंगे प्रोसीजर लिख देते हैं, जिससे कुल बिल और मेडिकल इंफ्लेशन दोनों तेजी से ऊपर जाते हैं.

क्या हेल्थ इंश्योरेंस सिस्टम फेल हो रहा है?

बढ़ती मेडिकल महंगाई के बीच आम आदमी को उम्मीद होती है कि हेल्थ इंश्योरेंस उन्हें इस वित्तीय संकट से बचाएगा. लेकिन मौजूदा हालात यह इशारा करते हैं कि बीमा तंत्र भी गंभीर दबाव में है और कई मोर्चों पर नाकाफी साबित हो रहा है:

बीमा कवर का छोटा पड़ जाना: कुछ साल पहले तक 3 लाख से 5 लाख रुपये का हेल्थ इंश्योरेंस पर्याप्त माना जाता था. लेकिन आज के समय में एक बड़े महानगर के कॉरपोरेट अस्पताल में गंभीर बीमारी (जैसे कैंसर या हार्ट सर्जरी) का खर्च आसानी से 10 से 15 लाख रुपये तक पहुंच जाता है. ऐसे में, पुराने और छोटे सम-इन्श्यर्ड  वाले प्लान मरीजों की पूरी सुरक्षा करने में असफल साबित हो रहे हैं.

प्रीमियम में बेतहाशा बढ़ोतरी: जैसे-जैसे मेडिकल क्लेम बढ़ रहे हैं और लोगों की उम्र बढ़ रही है, बीमा कंपनियां तेजी से हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम बढ़ा रही हैं. कई मामलों में देखा गया है कि हर साल प्रीमियम 15% से 25% तक महंगा हो जाता है. मध्यम वर्ग और वरिष्ठ नागरिकों के लिए इतना महंगा प्रीमियम भरना हर साल मुश्किल होता जा रहा है.

छुपे हुए नियम और क्लॉज़: कई बीमा पॉलिसियों में रूम रेंट, डॉक्टर की फीस और विशिष्ट बीमारियों के इलाज पर ‘सब-लिमिट’ (सीमाएं) तय होती हैं. इसके अलावा ‘को-पेमेंट’ (यानी बिल का एक हिस्सा खुद मरीज को देना होगा) जैसी शर्तें होती हैं. जब मरीज अस्पताल से डिस्चार्ज के समय बिल देखता है, तो उसे पता चलता है कि बीमा कंपनी ने पूरे बिल का भुगतान नहीं किया, जिससे उसे अपनी जेब से एक बड़ी रकम चुकानी पड़ती है.

दावा निपटान में देरी और मनमानी: अस्पतालों और बीमा कंपनियों (TPA) के बीच पारदर्शी तालमेल का अभाव अक्सर मरीजों के लिए मानसिक परेशानी का सबब बनता है. कैशलेस अप्रूवल मिलने में घंटों की देरी होती है, और कई बार वाजिब क्लेम भी विभिन्न तकनीकी कारणों से खारिज कर दिए जाते हैं.

इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता क्या है?

यदि मेडिकल इंफ्लेशन इसी गति से बढ़ती रही, तो आम आदमी के लिए इलाज कराना असंभव हो जाएगा. इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है:

अस्पतालों के बिलों पर नियामक नियंत्रण : सरकार और स्वास्थ्य नियामकों को निजी अस्पतालों में इलाज और दवाओं की दरों के लिए एक पारदर्शी ढांचा तैयार करना चाहिए, ताकि मनमाने बिलों पर लगाम लगाई जा सके.

बड़े सम-इन्श्यर्ड की ओर रुझान: उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे कम से कम 10 से 20 लाख रुपये तक का हेल्थ कवर लें, और साथ ही सुपर-टॉप अप पॉलिसियों का इस्तेमाल करें जो कम प्रीमियम में बड़ा कवर देती हैं.

निवारक स्वास्थ्य देखभाल: समय पर जांच और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है, जिससे अस्पताल के भारी-भरकम खर्चों से काफी हद तक राहत मिल सकती है.

संक्षेप में कहें तो, मेडिकल इंफ्लेशन का यह बढ़ता ग्राफ और स्वास्थ्य बीमा प्रणालियों की सीमाएं देश के मध्यम वर्ग और गरीब तबके के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती बन चुकी हैं. इस दिशा में सरकार, बीमा कंपनियों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को मिलकर एक दीर्घकालिक और जन-हितैषी समाधान खोजना होगा.

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *