Explained: ग्लोबल मोबिलिटी का गणित, पासपोर्ट रैंकिंग, ‘शेंगेन’ और वीज़ा फ्री ट्रैवल में भारत कहां खड़ा है?
भारतीय यात्रियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती लंबा वेटिंग टाइम और उच्च रिजेक्शन रेट है. गर्मियों और छुट्टियों के पीक सीजन में शेंगेन वीज़ा की अपॉइंटमेंट स्लाॉट मिलने में 2 से 3 महीने का समय लग जाता है.
वैश्वीकरण के इस दौर में किसी देश की ताकत केवल उसकी जीडीपी या सैन्य क्षमता से नहीं, बल्कि इस बात से भी मापी जाती है कि उसके नागरिकों को दुनिया भर में कितनी आसानी से यात्रा करने की आजादी है. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की इस भाषा को ‘ग्लोबल मोबिलिटी’ कहा जाता है.
वैश्विक पटल पर भारत की आर्थिक साख और कूटनीतिक धाक तो लगातार बढ़ रही है, लेकिन जब बात भारतीय पासपोर्ट की पावर और बिना वीज़ा यात्रा की आती है, तो स्थिति थोड़ी पेचीदा नजर आती है. हेनले पासपोर्ट इंडेक्स की हालिया रिपोर्ट, यूरोपीय संघ की सख्त ‘शेंगेन’ वीज़ा नीति और एशिया से लेकर कैरेबियाई देशों की ढील के बीच ग्लोबल मोबिलिटी के इस बड़े गणित में भारतीय पासपोर्ट आखिर कहां खड़ा है? आइए इसका गहन विश्लेषण करते हैं.
पासपोर्ट रैंकिंग का गणित, हेनले इंडेक्स में भारत का स्थान
हेनले एंड पार्टनर्स द्वारा जारी अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात प्राधिकरण (IATA) के आंकड़ों पर आधारित अक्टूबर 2026 की हेनले पासपोर्ट इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार, 199 पासपोर्टों की सूची में भारतीय पासपोर्ट 84वें स्थान पर है. अल्जीरिया और मॉरिटानिया के साथ भारत इस पायदान को साझा करता है.
भारतीय पासपोर्ट धारक फिलहाल दुनिया के 55 गंतव्यों में बिना किसी पूर्व-वीज़ा के यात्रा कर सकते हैं.
दुनिया के सबसे शक्तिशाली पासपोर्ट सिंगापुर और जापान, दक्षिण कोरिया व यूएई की तुलना में भारत की पहुंच अभी भी एक-तिहाई के आसपास ही सिमटी हुई है.
यह आंकड़ा यह स्पष्ट करता है कि भारत के पास आर्थिक और आबादी की ताकत भले ही हो, लेकिन ‘ट्रैवल फ्रीडम’ के मामले में भारतीय नागरिकों को अभी भी काफी कागजी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है.
शेंगेन का कड़ा पहरा, यूरोप का दरवाजा कितना खुला?
यूरोप के 29 देशों का ‘शेंगेन क्षेत्र’ भारतीय पर्यटकों, छात्रों और व्यापारियों के लिए सबसे पसंदीदा लेकिन सबसे मुश्किल पड़ाव माना जाता है. शेंगेन वीज़ा के मामले में भारत के साथ दो बड़े पहलू जुड़े हैं.
‘कैस्केड’ नियम से राहत
यूरोपीय संघ (EU) ने भारतीय नागरिकों के लिए वीज़ा नियमों में ढील देते हुए ‘कैस्केड स्कीम’ लागू की है. इस नियम के तहत, यदि किसी भारतीय नागरिक ने पिछले 3 वर्षों के भीतर दो शेंगेन वीज़ा का सही इस्तेमाल किया है, तो वह 2 साल के मल्टीपल-एंट्री वीज़ा के लिए योग्य हो जाता है.
इसके बाद 5 साल तक का मल्टीपल-एंट्री वीज़ा भी मिल सकता है. इसने बार-बार यूरोप जाने वाले बिजनेस क्लास और टूरिस्टों के लिए राह आसान की है.
रिजेक्शन रेट और अपॉइंटमेंट का संकट
राहत के बावजूद, भारतीय यात्रियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती लंबा वेटिंग टाइम और उच्च रिजेक्शन रेट है. गर्मियों और छुट्टियों के पीक सीजन में शेंगेन वीज़ा की अपॉइंटमेंट स्लाॉट मिलने में 2 से 3 महीने का समय लग जाता है.
अपर्याप्त बैंक बैलेंस, अधूरे ट्रेवल डॉक्यूमेंट्स या अवैध प्रवासन की आशंका के आधार पर 10% से 15% तक भारतीय आवेदनों को खारिज कर दिया जाता है, जिससे यात्रियों का भारी आर्थिक नुकसान होता है.
वीज़ा-फ्री और ‘वीज़ा ऑन अराइवल’, भारत का दायरा कहां बढ़ रहा है?
यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कड़े रुख के उलट, साउथ-ईस्ट एशिया, अफ्रीका और कैरेबियाई देशों ने भारतीय पर्यटकों का बांहें फैलाकर स्वागत किया है.
थाईलैंड, मलेशिया, नेपाल और भूटान जैसे देशों ने भारतीय पर्यटकों के लिए वीज़ा-फ्री प्रवेश या आसान ई-वीज़ा की व्यवस्था की है. मलेशिया ने भारतीय पर्यटकों को लुभाने के लिए वीज़ा-फ्री सुविधा को विस्तारित किया है.
इंडोनेशिया, मालदीव, श्रीलंका और कजाकिस्तान जैसे देश भारतीयों को ‘वीज़ा ऑन अराइवल’ (VoA) या फ्री-वीज़ा की सुविधा देते हैं.
कैरेबियन और अफ्रीकी देश
मॉरीशस, सेनेगल, रवांडा, बारबाडोस, फिजी और जमैका जैसे खूबसूरत पर्यटन स्थल भारतीय पासपोर्ट धारकों को बिना किसी पूर्व-वीज़ा के सीधे प्रवेश की अनुमति देते हैं.
भारतीय पासपोर्ट के पीछे क्यों रह जाने के 3 मुख्य कारण
भारत सरकार की मजबूत विदेश नीति के बावजूद भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग धीमी गति से सुधरने के पीछे तीन प्रमुख तकनीकी और सामाजिक कारण हैं.
अवैध प्रवासन और ओवरस्टे का डर: पश्चिमी देश (अमेरिका, यूके, कनाडा और यूरोप) अक्सर इस बात को लेकर सतर्क रहते हैं कि वीज़ा-फ्री या आसान वीज़ा का फायदा उठाकर लोग वहां अवैध रूप से न बस जाएं (‘डंकी’ रूट जैसी घटनाएं इसका बड़ा कारण हैं).
द्विपक्षीय पारस्परिकता: कई मामलों में भारत खुद विदेशी नागरिकों को आसानी से वीज़ा-फ्री एंट्री नहीं देता है. वीज़ा नीतियां अक्सर ‘जैसे को तैसा’ के सिद्धांत पर चलती हैं.
प्रति व्यक्ति आय और सुरक्षा चिंताएं: जिन देशों की प्रति व्यक्ति आय अधिक होती है और जिनके नागरिकों का आपराधिक या सुरक्षा रिकॉर्ड वैश्विक स्तर पर बेदाग होता है, उनके पासपोर्ट को स्वतः उच्च रैंकिंग मिलती है.
क्या भारत का पासपोर्ट ‘पावरफुल’ बन पाएगा?
भारत सरकार इस दिशा में लगातार काम कर रही है. ‘ई-पासपोर्ट’ की शुरुआत, जिसमें बायोमेट्रिक चिप लगी होती है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पासपोर्ट की सुरक्षा और विश्वसनीयता को बढ़ा रही है. इसके अलावा, गल्फ कंट्रीज (GCC) और मध्य पूर्व के देश भारत के साथ आर्थिक समझौतों के तहत वीज़ा प्रक्रियाओं को सरल बना रहे हैं.
‘ग्लोबल मोबिलिटी’ के पैमाने पर भारत आज एक संक्रमणकालीन मोड़ पर है. एशिया और अफ्रीका में जहां भारत के लिए दरवाजे तेजी से खुले हैं, वहीं यूरोप और पश्चिमी देशों में प्रवेश की राह अभी भी सख्त नियमों की जंजीरों में बंधी है. यदि भारत अवैध प्रवासन की चुनौती पर नकेल कसने और अधिक से अधिक देशों के साथ वीज़ा-फ्री समझौतों पर हस्ताक्षर करने में सफल रहता है, तो आने वाले सालों में भारतीय पासपोर्ट की ताकत और उसकी ग्लोबल मोबिलिटी में बड़ा सुधार देखा जा सकता है.
