उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हो रहे विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव भाजपा और सपा दोनों के लिए बेहद अहम हो गए हैं। शिक्षक और स्नातक कोटे की केवल 11 सीटों पर हो रहे चुनाव के लिए दोनों तरफ से ताकत झोंकी दी गई है। खुद सीएम योगी ने भाजपा के लिए चुनाव की कमान संभाल ली है। भाजपा के एमएलसी प्रत्याशियों को जिताने के लिए मुख्यमंत्री की लगातार जनसभाएं कर रहे हैं। चार दिन में आज चौथी जनसभा मिर्जापुर में होगी। सोमवार को गोरखपुर, मंगलवार को बरेली, बुधवार को वाराणसी में सीएम योगी ने एमएलसी प्रत्याशियों के लिए वोट मांगे।

वहीं, समाजवादी पार्टी ने विधानसभा चुनाव की तरह विधान परिषद में भी अंतिम समय में दो प्रत्याशियों को बदलकर बता दिया है कि यह चुनाव उनके लिए भी कितना महत्वपूर्ण है। समाजवादी पार्टी की तरफ से भी तमाम नेता और पदाधिकारी अपने प्रत्याशियों के पक्ष में जिले-जिले जुटे हुए हैं। अखिलेश यादव भी बैठकों के जरिए रणनीति बनाने में जुटे हैं। पहली बार सपा-भाजपा दोनों तरफ से इस चुनाव को लेकर इतनी गंभीरता दिखाई जा रही है। इस गंभीरता के पीछे तीन अहम कारण हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में मिली जीत के बाद से ही सपा उत्साहित है। उसे एक तरह से इस जीत ने भाजपा पर मनोवैज्ञानिक बढ़त दिला दी है। सपा की इसी बढ़त को खत्म करने के लिए विधानसभा चुनाव से पहले एमएलसी का चुनाव जीतना भाजपा के लिए अहम हो गया है। पिछली बार भाजपा ने 11 में से छह सीटें जीती थीं। इस बार उसकी कोशिश उससे ज्यादा सीटों पर कब्जे की है। दूसरी ओर सपा किसी भी तरह लोकसभा चुनाव में बने माहौल को विधानसभा चुनाव तक बनाए रखना चाहती है। ऐसे में उसे भी एमएलसी में जीत चाहिए।

एमएलसी चुनाव को विधानसभा चुनाव का लिटमस टेस्ट माना जा रहा है। इस चुनाव में सीटें भले ही केवल 11 हैं लेकिन तीन अहम वजहें इसे खास बना रही हैं।

पहली वजह ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से चुनाव है। बैलेट से हो रहे चुनाव में अगर भाजपा जीतती है तो सपा और विपक्ष के ईवीएम वाले नैरेटिव को ध्वस्त करने में मदद मिलेगी। दूसरी तरफ, अगर सपा जीती तो ईवीएम पर लगाए जा रहे आरोपों को बल देगी और भाजपा के साथ चुनाव आयोग के खिलाफ खुले मोर्चे को विधानसभा चुनाव तक लेकर जाएगी।इस चुनाव के वोटर हैं। इस चुनाव में वोट केवल शिक्षक और स्नातक यानी पढ़े-लिखे ऐसे लोग देंगे जिन्हें शायद बरगलाया नहीं जा सकता है। माना जाता है कि ऐसे लोग ही समाज को दिशा देने का भी काम करते हैं। इन लोगों का समर्थन किसी भी पार्टी के पक्ष में होना अपने आप में अहम हो जाता है। जो भी जीता वह कह सकता है कि देश का बुद्धिजीवी और पढ़ा-लिखा वर्ग उसके साथ है।

सबसे अहम है। 11 सीटों पर हो रहे चुनाव के वोटर केवल 11 जिलों के नहीं है। पश्चिम से पूरब तक इसके वोटरों का फैलाव है। एक तरह से इन 11 सीटों पर सभी 75 जिले कवर हो जाते हैं। ऐसे में इस चुनाव को विधानसभा चुनाव का मूड या सर्वेक्षण भी माना जाएगा। इसमें मिली जीत दोनों ही दलों को विरोधी पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में भी मदद देगी।

एमएलसी की 11 सीटों 5 स्नातक और 6 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए चुनाव हो रहा है। स्नातक में लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ और इलाहाबाद-झांसी खंड स्नातक की सीटें हैं। इसी तरह शिक्षक के लिए लखनऊ, आगरा, वाराणसी, मेरठ, बरेली-मुरादाबाद और गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन की सीटें हैं।

सीट पर नौ जिले हैं। इसमें लखनऊ, हरदोई, लखीमपुर खीरी, रायबरेली, सीतापुर, उन्नाव, बाराबंकी, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर शामिल हैं।

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