महाराष्ट्र में इस समय शिवसेना के ठाकरे और शिंदे गुटों के बीच घमासान लड़ाई चल रही है। इन दोनों में से एक विजेता हालांकि पहले ही सामने आ चुका है। यह भाजपा है जिसे शिवसेना के बंटवारे से फायदे होगा।

आगामी बी.एम.सी. चुनावों में मराठी वोटों का बंटवारा निश्चित तौर पर भाजपा को फायदा पहुंचाएगा।

मुम्बई नगर निगम चुनावों में जीत एक उत्प्रेरक या कम से कम महाराष्ट्रीयन मतदाताओं के साथ भाजपा की लोकप्रियता सूचकांक में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन जाएगी। अंतिम परिणाम राजनीतिक परिदृश्य पर शिंदे गुट को ग्रहण लगा सकता है। यदि शिवसेना बी.एम.सी. का चुनाव हार जाती है जैसा कि अब होने की संभावना है, तो क्षेत्र में अपना संचालन बनाए रखने की उसकी क्षमता गंभीर रूप से क्षीण हो जाएगी जिससे समर्थकों का और भी ज्यादा नुक्सान होगा। भाजपा यह बात जानती है कि उसे इससे ही लाभ होगा।

2 गुटों के बीच की लड़ाई एक हास्य मोड़ ले रही है। ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि चुनाव आयोग एकीकृत सेना के प्रतीक ‘धनुष और तीर’ को खत्म कर देगा। इसने ठीक वैसा ही किया। इसने 2 युद्धरत गुटों को नए नाम और नए चुनाव चिन्ह अपनाने का निर्देश दिया। उद्धव ठाकरे गुट ने अपने नाम के रूप में ‘शिवसेना उद्धव बालासाहब ठाकरे’ को चुना। शिंदे गुट ने ‘बालासाहेबंची शिवसेना’ को चुना। दोनों पक्षों ने बालासाहब की विरासत पर दावा किया। उस संबंध के बिना दोनों ही खुद को विकलांग मानते थे।

बालासाहब किस गुट का पक्ष लेंगे? उस प्रासंगिक प्रश्र का उत्तर स्पष्ट है। पूरी दुनिया में हर विषम संस्कृति में पिता अपनी संतान के लिए खुद ही तड़पेगा। भारत में ऐसा दोगुनी मात्रा में होता है। अपनी मृत्यु से पूर्व बालासाहब ठाकरे ने शिवाजी पार्क में एकत्रित अपने अनुयायियों से उद्धव और आदित्य की देखभाल करने के लिए सार्वजनिक रूप से अपील की थी। किसी भी मराठी के मन में पिता की पसंद को लेकर जरा भी संशय नहीं है।

शिवसेना प्रमुख के तौर पर जब राज ठाकरे ने बालासाहब की विरासत को आगे बढ़ाना चाहा तो उनका कद छोटा कर दिया गया। राज ठाकरे अब प्रासंगिक बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वह दिखने और बोलने में बालासाहब से मिलते-जुलते हैं बालासाहब की तरह ही उन्होंने अपने अनुयायियों को हिंसा का प्रयोग करने का निर्देश देने में रत्ती भर भी संकोच नहीं किया लेकिन वे तो केवल भतीजे हैं जबकि सज्जन पुरुष उद्धव उनके पुत्र हैं।

मुम्बई शहर के शिवसैनिक हैरान हैं। वे नहीं जानते कि जो हो रहा है उससे आगे क्या स्थिति बनेगी। वे सेना के पहले अवतार की तरह सड़कों पर उतरने के आदी थे जब बालासाहब ठाकरे ने इसे लगभग शून्य से ऊपर उठाया था। वह ‘मराठी मानुष’ के तौर पर जाने जाते थे। बालासाहब ठाकरे ने अपने अनुयायियों को उनके गौरव की बहाली का वादा किया था जिससे उनके समर्थक उत्साहित थे। वहीं शिंदे गुट की ङ्क्षहदुत्व की बात ने ज्यादा प्रभावित नहीं किया। बालासाहब ठाकरे हिंदुत्व के फालतू विचारों की तुलना में मराठी मानुष के जीवन स्तर से अधिक चिंतित थे। जो मूलरूप से एक राजनीतिक अवधारणा थी। उद्धव ठाकरे ने उनका ध्यान सड़क पर होने वाली हिंसा से हटाकर बेहतर अच्छाइयों के लिए अधिक परिष्कृत संघर्ष की ओर लगाया है।

शिवसैनिक अपने शाखा प्रमुखों और उपशाखा प्रमुखों के आदेशों की पालना करते हैं। वे उद्धव व शिंदे की अपीलों को सुनते हैं लेकिन वे जानते हैं कि जिन विधायकों और मंत्रियों ने विद्रोह में शामिल होने के लिए मूल गठन से शिंदे का अनुसरण किया है उसके लिए व्यक्तिगत कारण भी थे। यह अभी निश्चित नहीं है कि सैनिक आखिर किस तरफ जाएंगे।

पहली बड़ी परीक्षा तब होगी जब अगले महीने अंधेरी पूर्व निर्वाचन क्षेत्र के लिए उप चुनाव होंगे। क्षेत्र के सेना एम.एल.ए. रमेश लटके की मतदाताओं ने बहुत प्रशंसा की। यहां तक कि जो सेना से नहीं जुड़े थे उन्होंने भी उनकी भरपूर प्रशंसा की। वह एक विनम्र इंसान तथा सभी के लिए मददगार थे। उद्धव गुट ने दिवंगत रमेश लटके की विधवा को अपना उम्मीदवार बनाया। इस पर राकांपा और कांग्रेस ने समर्थन का वायदा किया। शिंदे के समर्थन वाली भाजपा उस उम्मीदवार का विरोध कर रही है।

शिंदे गुट जो अब अपने नए साथी भाजपा के साथ राज्य पर शासन करता है वह यह सुनिश्चित करने के लिए संबंधित सरकारी अधिकारी का प्रयोग करने के लिए कोशिश की ताकि लटके की विधवा चुनाव न लड़ पाए। वह मुम्बई नगर निगम में क्लर्क की नौकरी करती थी। इसलिए रिटॄनग ऑफिसर द्वारा उनकी उम्मीदवारी स्वीकार किए जाने से पहले उन्हें पहले अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। नामांकन पत्र भरने की आखिरी तारीख 14 अक्तूबर थी और लटके की विधवा ने महीने की 3 तारीख को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। उन्होंने बाम्बे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जिसने आयुक्त को 13 तारीख तक इस्तीफा स्वीकार करने और श्रीमती लटके को स्वीकृति पत्र मौके पर ही देने का आदेश दिया।

शिंदे गुट को अपनी ही चाल के लिए भुगतना पड़ा। गुट को एहसास हुआ कि वह ही जीतेगा और इसके तुरन्त बाद उसके सहयोगी राज ठाकरे ने शिंदे गुट और भाजपा के लिए एक अपील जारी की। उप-चुनाव का नतीजा शिंदे गुट के लिए हानिकारक होता। हर शिवसैनिक और हर मुम्बई वासी नगर निगम का नियंत्रण चाहता है। बी.एम.सी. का राजस्व भारत के किसी भी छोटे से राज्य के राजस्व से अधिक है। यदि शिवसेना बी.एम.सी. पर अपना नियंत्रण खो देती है तो वर्तमान में बालासाहब की पार्टी के गुमनामी में जाने की संभावना है।

2022-10-22 18:08:16 https://wisdomindia.news/?p=7323
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