तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न सिर्फ राज्य की राजनीति को पलट कर रख दिया है, बल्कि इसका असर अब देश की राजधानी दिल्ली और संसद के भीतर भी दिखने लगा है। तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और कांग्रेस के बीच गठबंधन टूटने के बाद केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा (BJP) इस टूट में अपने लिए संभावनाएं तलाश रही है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा राष्ट्रीय राजनीति और संसद के भीतर अपने आंकड़ों को मजबूत करने के लिए द्रमुक के करीब आने की संभावनाओं पर विचार कर रही है। भाजपा के रणनीतिकारों को लगता है कि संसद में राष्ट्रीय मुद्दों पर द्रमुक का मुद्दों के आधार पर समर्थन हासिल किया जा सकता है।
तमिलनाडु चुनाव के दौरान कांग्रेस द्वारा द्रमुक का साथ छोड़कर सुपरस्टार विजय की पार्टी तमिझगा वेत्री कड़गम (TVK) का दामन थामने से द्रमुक बेहद नाराज है। द्रमुक ने कांग्रेस पर पीठ में छुरा घोंपने का आरोप लगाया है। यह तल्खी इस कदर बढ़ चुकी है कि द्रमुक ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर संसद में अपने सांसदों के बैठने की व्यवस्था बदलने की मांग की है, क्योंकि वे अब कांग्रेस के साथ नहीं बैठना चाहते। इस तल्खी के अलावा कुछ और भी कारण हैं जो भाजपा को द्रमुक की तरफ देखने पर मजबूर कर रहे हैं।
सुपरस्टार विजय की पार्टी टीवीके ने राज्य में द्रमुक और अन्नाद्रमुक (AIADMK) के छह दशक पुराने दबदबे को खत्म कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इस करारी हार के बाद द्रमुक बैकफुट पर है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी क्षेत्रीय दल के लिए राज्य और केंद्र दोनों जगह एक साथ विपक्ष में रहना बेहद मुश्किल होता है। ऐसे में द्रमुक को केंद्र सरकार के साथ कामकाजी रिश्ते बनाने पड़ सकते हैं।
द्रमुक के लिए भाजपा अछूती नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग (NDA) सरकार में द्रमुक एक समय शामिल रह चुकी है। इसलिए पुराने रिश्तों को नए संदर्भ में जीवित करना असंभव नहीं माना जा रहा।
भले ही दोनों दल एक-दूसरे के करीब आने की सोचें, लेकिन वैचारिक और नीतिगत स्तर पर दो ऐसे मुद्दे हैं जिन पर समझौता करना एम.के. स्टालिन की पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। द्रमुक केंद्र सरकार के परिसीमन प्लान की घोर विरोधी रही है। उसने पूरा विधानसभा चुनाव इसी मुद्दे पर लड़ा कि भाजपा दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व को कम करना चाहती है। द्रमुक सांसदों ने संसद में इसके खिलाफ काले कपड़े पहनकर प्रदर्शन किया था और बिल की कॉपियां तक जलाई थीं। इस स्टैंड से पीछे हटना स्टालिन के लिए बड़ी राजनीतिक मुसीबत बन सकता है।
पूर्व उप-मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन धर्म को लेकर की गई टिप्पणियों और इसे समाप्त करने के बयानों ने भाजपा और द्रमुक के बीच एक गहरी वैचारिक खाई पैदा की है। इस संवेदनशील मुद्दे पर दोनों दलों के लिए कोई बीच का रास्ता निकालना बेहद पेचीदा होगा।
भाजपा मुख्य रूप से संसद के भीतर अपने आंकड़ों को दुरुस्त करना चाहती है। हाल ही में हुए परिसीमन विधेयक पर मतदान के दौरान भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए दो-तिहाई बहुमत जुटाने में नाकाम रहा था। संसद में दो-तिहाई बहुमत के लिए 362 का आंकड़ा चाहिए, जिससे एनडीए अभी 70 सीटें दूर है। पिछले मतदान के दौरान सदन में 528 सांसद मौजूद थे, जहां एनडीए को 298 वोट मिले, जबकि विरोध में 230 वोट पड़े। एनडीए दो-तिहाई के आंकड़े से 54 वोट पीछे रह गया। तब द्रमुक के 22 सांसदों ने विपक्ष के साथ मिलकर इसके खिलाफ वोट किया था। अगर भविष्य में द्रमुक के ये 22 सांसद साथ आते हैं या वॉकआउट करते हैं, तो भाजपा जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंच सकती है।
भाजपा द्रमुक को सीधे एनडीए में शामिल करने के बजाय नवीन पटनायक (BJD), जगन मोहन रेड्डी (YSRCP) या केसीआर (BRS) वाले मॉडल पर साधना चाहती है। यानी द्रमुक एनडीए से बाहर रहकर भी केंद्र को अहम विधेयकों पर बाहर से या मुद्दों के आधार पर समर्थन दे। भाजपा का तमिलनाडु में पारंपरिक सहयोगी दल अन्नाद्रमुक चुनाव हारने के बाद अंदरूनी बगावत से जूझ रहा है। सूत्रों का कहना है कि अन्नाद्रमुक टूटने की कगार पर है और उसके दोनों गुटों को अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए केंद्र (भाजपा) के सहारे की जरूरत होगी। जब अन्नाद्रमुक खुद कमजोर हो रही है तो भाजपा के लिए द्रमुक से हाथ मिलाने का रास्ता और साफ हो जाता है।
पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में बड़ी जीत दर्ज करने के बाद भाजपा मजबूत तो हुई है, लेकिन अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए वह कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। संसद में दो-तिहाई बहुमत की कमी रणनीतिकारों को खटक रही है। भाजपा की कोशिश होगी कि राष्ट्रपति चुनाव में द्रमुक के वोट उनके पाले में आएं।
