नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के रूप में बिहार के सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अपने कार्यकाल में खासकर महिलाओं के सशक्तीकरण को लेकर कई ठोस कदम उठाए गए, जिसकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर सराहना हुई। उनकी योजनाओं ने बिहार की महिलाओं के साथ ही पिछड़ा,अति पिछड़ा, दलित, महादलित और अल्पसंख्यक समाज की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बेहतर करने में काफी मदद की।

नीतीश सरकार ने देश में पहली बार बिहार की महिलाओं को त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था और नगर निकायों में 50 फीसदी आरक्षण दिया। इससे निचले स्तर पर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़कर 55 फीसदी तक हो गई है। बाद में आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, केरल, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, त्रिपुरा, उत्तराखंड आदि ने भी इस फैसले का अनुसरण किया।

2013 में नीतीश कुमार ने बिहार पुलिस में 35 फीसदी महिला आरक्षण लागू किया। इसका प्रभाव हुआ कि आज बिहार में कुल पुलिस बल का लगभग 30 फीसदी महिलाएं हैं और महिला पुलिस की संख्या 31 हजार से अधिक हो गई है। नीतीश सरकार ने 2016 से सभी सरकारी सेवाओं में महिलाओं के लिए 35 फीसदी क्षैतिज आरक्षण लागू कर दिया। राज्य के इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों के नामांकन में भी लड़कियों को 33 फीसदी आरक्षण लागू है।

ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण और गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य के साथ 2006 में बिहार में जीविका (बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसाइटी) परियोजना की शुरुआत की। आज इससे एक करोड़ 40 लाख से अधिक महिलाएं जुड़कर ‘जीविका दीदी’ के रूप में कार्य कर रही हैं। यह महिलाएं 11.03 लाख स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में गोलंबद हैं। इसकी तर्ज पर केंद्र सरकार ने पूरे देश में आजीविका मिशन लागू किया है।

महिलाओं को रोजगार से जोड़ने और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से 2025 में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की शुरुआत की गई। इसके तहत अब तक 1.81 करोड़ महिलाओं को उनके बैंक खाते में 10-10 हजार रुपये भेजे गए हैं। इनमें रोजगार बढ़ाने की इच्छा रखने वाली महिलाओं को दो-दो लाख रुपये तक की अतिरिक्त सहायता दी जाएगी।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी नीतीश कुमार ने काफी काम किया। उनके कार्यकाल के दौरान 2008-09 में कन्या उत्थान योजना शुरू की गई। इसके परिणाम स्वरूप जन्म पंजीकरण में भारी वृद्धि हुई। एनएफएचएस के आंकड़ों के मुताबिक, जन्म पंजीकरण दर 54.9% बढ़कर 5.8 से 60.7 हो गया है। जननी बाल सुरक्षा योजना से संस्थागत प्रसव में वृद्धि हुई। आशा और ममता जैसी प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्य कर्ताओं से गर्भवतियों व स्तनपान कराने वाली माताओं को स्वास्थ्य सुरक्षा दी गई। वर्ष 2006-07 में केवल चार प्रतिशत महिलाएं ही संस्थागत प्रसव के लिए अस्पताल आती थीं, जो बढ़कर 50 प्रतिशत से अधिक हो गया है।

अप्रैल 2016 से पूरे राज्य में देशी शराब और विदेशी शराब पर प्रतिबंध लगाने का कड़ा और ऐतिहासिक निर्णय लिया। गांधी जयंती पर दो 2 अक्टूबर, 2016 को नया मद्य निषेध अधिनियम पूरे राज्य में लागू किया गया। यह सामाजिक सुधार की दिशा में बहुत बड़ा कदम रहा। शराबबंदी ने महिलाओं के लिए सामाजिक क्रांति लाई। इससे घरेलू हिंसा में 35 से 40 फीसदी कमी आई और परिवारों में शांति स्थापित हुई। महिलाओं की बचत बढ़ी। अपराध की दर घटी।

नीतीश कुमार ने 2005 के बाद अपराध पर नियंत्रण के लिए स्पीडी ट्रायल और सख्त पुलिसिंग को बढ़ावा दिया। इससे बिहार की छवि में बड़ा बदलाव आया। बाहुबलियों को जेल भेजा गया और शाम होते ही घरों में दुबक जाने वाले लोग रात-बेरात सड़कों पर निकलने लगे। मुख्यमंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान भी अपनी इस उपलब्धि का लगातार बखान किया।

बाल विवाह और दहेज प्रथा को जड़ से खत्म करने के लिए 2017 से एक व्यापक राज्यव्यापी अभियान की शुरुआत की। शुरुआत में ही करीब ढाई करोड़ लोगों ने बाल विवाह और दहेज प्रथा को समाप्त करने की शपथ ली। इसमें पंचायत प्रतिनिधि, स्कूली छात्रों, सरकारी अधिकारी, गैर-सरकारी कार्यकर्ता व आम जनता भी शामिल हुए। लड़कियों की शैक्षणिक स्थिति में सुधार, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक सुरक्षा उपायों के चलते पिछले वर्षों में बाल विवाह की दर में भारी कमी आई है। मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना के तहत राज्य के सभी 38 जिलों में महिला हेल्पलाइन स्थापित किया। यह हेल्पलाइन घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और अन्य सामाजिक बुराइयों से पीड़ितों को मनोवैज्ञानिक परामर्श, चिकित्सा और कानूनी सहायता प्रदान करती है।

2009-10 से अक्षर अंचल योजना चलायी, जिससे 67 लाख से अधिक महिलाएं साक्षर हुईं। 2013 में महादलित, अल्पसंख्यक और अति पिछड़ा वर्ग को भी इस योजना से जोड़ा गया। इसके कारण बिहार में महिलाओं और एससी-एसटी की साक्षरता में पूरे देश की तुलना में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई। इस उपलब्धि के कारण बिहार को राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार प्राप्त हुआ।

‘हुनर’ के तहत अल्पसंख्यक समुदायों की हजारों लड़कियों को विभिन्न व्यवसायों का व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया है। फिर उन्हें ‘औजार’ कार्यक्रम के तहत टूल-किट दी गई, ताकि वे स्वरोजगार शुरू कर सकें और आत्मनिर्भर बन सकें। महादलित टोलों के विकास को लेकर इनकी बहुलता वाली पंचायत और शहरी वार्डों में समुदाय से ही विकास मित्र बहाल किए गए।
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