कुलपति प्रो. डॉ. हिमांशु ऐरन ने कहा—औषधीय एवं सुगंधित पौधे भविष्य की सतत स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था की आधारशिला
देहरादून।
रास बिहारी बोस सुभारती विश्वविद्यालय (RBBSU), देहरादून में प्रकृति एवं संस्कृति विकास फाउंडेशन के सहयोग से विश्वविद्यालय परिसर में औषधीय एवं सुगंधित पौधों का पौधरोपण कार्यक्रम गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना, जैव-विविधता को समृद्ध करना तथा बहुमूल्य पादप संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन को प्रोत्साहित करना रहा।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सुगंधित पादप केंद्र के निदेशक डॉ. निरपेंद्र चौहान उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में एमटीवी बीआर एवं चैरिटेबल ट्रस्ट के न्यासी श्री यशवर्धन महोदय शामिल हुए। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर डॉ. हिमांशु ऐरन, प्रो वाइस चांसलर डॉ. देश दीपक महोदय, रजिस्ट्रार श्री खालिद हसन, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विजय भट्ट मानव संसाधन विकास संस्थान, गोपेश्वर, उत्तराखंड तथा सुगंधित पादप केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. ललित अग्रवाल की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।
कार्यक्रम की शुरुआत औषधीय एवं सुगंधित पौधों के पौधरोपण से हुई। इस अवसर पर वक्ताओं ने इन पौधों के वैज्ञानिक, औषधीय और आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इनके संरक्षण को समय की आवश्यकता बताया।
डॉ. विजय भट्ट ने अपने मुख्य भाषण में कहा कि औषधीय एवं सुगंधित पौधे न केवल पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की आधारशिला हैं, बल्कि आधुनिक फार्मास्यूटिकल उद्योग और ग्रामीण आजीविका के लिए भी महत्वपूर्ण संसाधन हैं। उन्होंने बताया कि यदि वैज्ञानिक पद्धति से इनकी खेती को बढ़ावा दिया जाए तो यह उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
मुख्य अतिथि डॉ. निरपेंद्र चौहान ने सुगंधित पौधों की वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वैश्विक बाजार में इनकी मांग निरंतर बढ़ रही है। उन्होंने छात्रों को अनुसंधान, संरक्षण और व्यावसायिक खेती के क्षेत्र में आगे आने के लिए प्रेरित किया तथा नेचर एंड कल्चर डेवलपमेंट फाउंडेशन को भविष्य में भी इसी प्रकार सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया।
एमटीवी बीआर एवं चैरिटेबल ट्रस्ट के न्यासी श्री यशवर्धन महोदय ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, इसके लिए सामाजिक संस्थाओं और शैक्षणिक संगठनों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। उन्होंने सामुदायिक सहभागिता को सतत विकास की कुंजी बताया।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. हिमांशु ऐरन ने अपने संबोधन में कहा कि औषधीय एवं सुगंधित पौधे जैव-सक्रिय (bioactive) यौगिकों का समृद्ध स्रोत हैं, जो आधुनिक चिकित्सा, न्यूट्रास्यूटिकल्स और आयुष आधारित उपचार पद्धतियों के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे पौधों का संरक्षण केवल पारिस्थितिक संतुलन के लिए ही नहीं, बल्कि ‘प्रिवेंटिव हेल्थ केयर’ और ‘सस्टेनेबल हेल्थ सिस्टम’ की स्थापना के लिए भी आवश्यक है।
उन्होंने आगे कहा कि विश्वविद्यालय परिसर में इस प्रकार के पौधों का रोपण विद्यार्थियों को ‘लिविंग लैब’ (Living Laboratory) का अनुभव प्रदान करेगा, जिससे वे शोध और उद्यमिता के क्षेत्र में नए अवसर तलाश सकेंगे। उन्होंने इसे विश्वविद्यालय की अकादमिक उत्कृष्टता, सामाजिक उत्तरदायित्व और हरित परिसर की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
यह आयोजन उत्तराखंड जैसे जैव-विविधता से समृद्ध राज्य में विशेष महत्व रखता है। पर्वतीय क्षेत्रों में औषधीय एवं सुगंधित पौधों की प्राकृतिक उपलब्धता राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शैक्षणिक संस्थान, अनुसंधान केंद्र और सामाजिक संगठन मिलकर कार्य करें तो उत्तराखंड ‘हर्बल हब’ के रूप में विकसित हो सकता है।
रास बिहारी बोस सुभारती विश्वविद्यालय के लिए यह कार्यक्रम केवल एक वृक्षारोपण अभियान नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना, अनुसंधान-आधारित शिक्षा और सामाजिक सहभागिता की सशक्त अभिव्यक्ति है। इससे विश्वविद्यालय की हरित एवं नवाचार-उन्मुख पहचान को नई मजबूती मिली है।
कार्यक्रम के अंत में नेचर एंड कल्चर डेवलपमेंट फाउंडेशन की अध्यक्ष एवं रसायन विभाग की प्रमुख डॉ. निशात अंजुम ने श्री दिगंबर के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन, अतिथियों, संकाय सदस्यों और छात्रों के प्रति आभार व्यक्त किया।
समापन पर सभी उपस्थितजनों ने पर्यावरण संरक्षण और सतत वृक्षारोपण को बढ़ावा देने की सामूहिक प्रतिज्ञा ली।
