विनीत नायर

भारत में कई ऐसे मौके आए जब नई तकनीक अथवा नए सिस्टम को लेकर एक वर्ग ने सवाल उठाए। आधार कार्ड का ही उदाहरण ले लीजिए। जब भारत ने आधार बनाने का फैसला किया था, तब बहुत लोगों को शक था। इतनी बड़ी आबादी, इतनी अलग-अलग ज़रूरतें और कम सुविधाओं के बीच ऐसा सिस्टम बनाना आसान नहीं था। आसान रास्ता यह था कि भारत किसी छोटे देश का मॉडल अपनाता।लेकिन भारत ने मुश्किल रास्ता चुना।

आधार को सफल बनाने वाली बात सिर्फ़ उसकी तकनीक नहीं थी, बल्कि उसका लगातार इस्तेमाल था। डिजिटल इंडिया के ज़रिये इसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़ा गया। इसे शुरू से काफी सोचकर बनाया गया और धीरे-धीरे ज़मीन पर उतारा गया। इससे सरकारी सेवाओं में बड़ा बदलाव आया।

आज भारत शिक्षा में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर ठीक उसी तरह के मोड़ पर खड़ा है।

सवाल यह नहीं है कि एआई स्कूलों में आएगा या नहीं—वह आ चुका है। असली सवाल यह है कि क्या भारत एआई का इस्तेमाल सिर्फ़ पुराने तरीकों को कंप्यूटर पर लाने के लिए करेगा, या फिर अपनी ज़मीनी सच्चाई को ध्यान में रखकर कुछ नया बनाएगा।

सिर्फ़ नकल नहीं, अपनी सोच
दुनिया भर में शिक्षा के क्षेत्र में एआई को लेकर जो बातें हो रही हैं, वे ज़्यादातर ऐसे देशों की हैं जहाँ स्कूल छोटे हैं, बच्चे एक जैसे हैं और सुविधाएँ ज़्यादा हैं। भारत जैसे विविधता वाले देश पर ये पूरी तरह लागू नहीं होते।

भारत को किसी और का मॉडल अपनाने की ज़रूरत नहीं है। भारत को अपनी ज़रूरत के हिसाब से समाधान बनाने हैं। अगर एआई सिर्फ़ दिखावे के लिए इस्तेमाल हुआ, तो कोई फ़ायदा नहीं होगा। लेकिन अगर इससे असली समस्याएँ हल की गईं, तो बड़ा बदलाव आ सकता है।

एआई कोई साधारण तकनीक नहीं है। यह काम करने की ताक़त बढ़ा सकती है—लेकिन तभी, जब इसका मकसद साफ़ हो और इसका इस्तेमाल क्लासरूम्स की रोजमर्रा की जरूरतों और सच्चाई से जुड़ा हो।

बड़ा पैमाना, बड़ी ताक़त
अक्सर कहा जाता है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था बहुत बड़ी है, इसलिए उसे सुधारना मुश्किल है। लेकिन यही सोच ग़लत है। अगर सही तरीके से काम किया जाए, तो बड़ा पैमाना ताक़त बन सकता है। भारत की आईटी इंडस्ट्री इसका उदाहरण है। भारत के स्कूलों में अलग-अलग भाषा बोलने वाले, अलग स्तर के बच्चे एक ही कक्षा में पढ़ते हैं। इसे आमतौर पर समस्या माना जाता है, लेकिन यही मौका भी है।

अगर एआई को इस विविधता को ध्यान में रखकर बनाया जाए, तो वह बहुत मज़बूत बन सकता है। इसके लिए ज़रूरी है कि हम नकल न करें, बल्कि अपनी ज़रूरत से शुरुआत करें।

सरकारी स्कूल इस काम के लिए सबसे सही जगह हैं। सही नीतियों और सही दिशा के साथ, एआई शिक्षा को धीरे-धीरे और लगातार बेहतर बना सकता है।

एआई को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं यह शिक्षक की जगह न ले ले। लेकिन असली सवाल यह है कि एआई शिक्षक की मदद कैसे कर सकता है।

अगर सही तरह से इस्तेमाल किया जाए, तो एआई काग़ज़ी काम कम कर सकता है, बच्चों की कमज़ोरी जल्दी पकड़ सकता है और पढ़ाना आसान बना सकता है। अगर शिक्षक को पढ़ाने के लिए थोड़ा ज़्यादा समय मिल जाए, तो बच्चों का सीखना अपने-आप बेहतर होगा।

अनुभव बताता है कि शिक्षक तब अच्छा पढ़ाते हैं, जब उन्हें सहारा मिलता है। एआई का असली काम शिक्षक को मज़बूत बनाना है, न कि उन्हें हटाना।

दिखावे से बचना ज़रूरी
हर नई तकनीक के साथ यह खतरा रहता है कि लोग जल्दी नतीजे दिखाने लगें, लेकिन असली बदलाव न हो। एआई में भी यही खतरा है।

असली फ़ायदा तभी होगा जब यह सोचा जाए कि पढ़ाई कैसे कराई जाती है, फैसले कैसे लिए जाते हैं और बच्चों की प्रगति कैसे मापी जाती है। सिर्फ़ डेटा होने से कुछ नहीं होता। सही सोच और सही इरादे ज़रूरी हैं।

सरकार की भूमिका यहाँ बहुत अहम है। वह एआई को छोटे-छोटे प्रयोगों से निकालकर ऐसे सिस्टम में बदल सकती है, जो लंबे समय तक काम आए।

इसीलिए राजधानी दिल्ली में 16 से 20 फरवरी के बीच आयोजित होने वाले इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट जैसे मंच ज़रूरी हैं। ये नई तकनीक दिखाने के लिए नहीं, बल्कि सही दिशा तय करने के लिए बहुत अहम पड़ाव और मंच साबित हो सकते हैं।

आख़िरी बच्चे तक पहुँचना
अगर भारत को अलग तरह से आगे बढ़ना है, तो एक बात साफ़ होनी चाहिए कि एआई के जरिए हमें देश के प्रत्येक बच्चे तक पहुंचना होगा। ऐसा नहीं कि सिर्फ शहरी इलाकों पर फोकस हो।

और एआई शिक्षक की मदद करे, उनकी जगह न ले। कई निजी मॉडल बिना शिक्षक वाली पढ़ाई की बात करते हैं, लेकिन अनुभव बताता है कि बच्चे तभी सीखते हैं जब शिक्षक कक्षा में उन्हें प्रेरित करते हैं।

भारत के पास बड़ा मौका है—एआई को ऐसा बनाने का, जो इंसानों की ताक़त बढ़ाए, सरकारी स्कूलों को मज़बूत करे और ज़्यादा बच्चों तक शिक्षा पहुँचाए। जैसे आईटी सेक्टर में हुआ, वैसे ही शिक्षा में भी हो सकता है।

जब आने वाले समय में शिक्षा का इतिहास लिखा जाएगा, तो एआई को उसकी तकनीक के लिए नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए याद किया जाना चाहिए जिन तक वह हमें पहुँचा सका और पढ़ाई को आसान और असरदार बनाया।

(विनीत नायर एचसीएल टेक्नोलॉजीज़ के पूर्व सीईओ और संपर्क फाउंडेशन के संस्थापक हैं)

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *