Explained: आज भी देश की जेलों से कैसे निकल भागते हैं कैदी? तमिलनाडु में सियासत तेज, सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल
तमिलनाडु में एक सांझा सेल में बंद 17 विचारणाधीन कैदियों ने जिस तरह ‘मेडिकल इमरजेंसी’ का झूठा नाटक रचकर और सुरक्षाकर्मियों पर हमला कर जेल ब्रेक किया.

देश की जेलों को सुरक्षा व्यवस्था का सबसे अभेद्य किला माना जाता है. ऊंची-ऊंची दीवारें, चौबीसों घंटे पहरा, सीसीटीवी कैमरे और आधुनिक सुरक्षा उपकरण इन सब के बावजूद भारतीय जेलों से कैदियों के भागने की घटनाएं गाहे-बगाहे शासन और प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर देती हैं. तमिलनाडु के थेनी जिले से सामने आई हालिया घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर तकनीक और चाक-चौबंद सुरक्षा के इस दौर में भी कैदी इतनी आसानी से जेल से कैसे निकल भागते हैं.
तमिलनाडु में एक सांझा सेल में बंद 17 विचारणाधीन कैदियों ने जिस तरह ‘मेडिकल इमरजेंसी’ का झूठा नाटक रचकर और सुरक्षाकर्मियों पर हमला कर जेल ब्रेक किया, उसने पूरे देश की जेल सुरक्षा प्रणाली में मौजूद बुनियादी खामियों को उजागर कर दिया है.
क्या है तमिलनाडु की पूरी घटना?
तमिलनाडु के थेनी जिलांतर्गत एंडीपट्टी के पास स्थित थेक्कमपट्टी जिला जेल में सोमवार देर रात एक बेहद चौंकाने वाली घटना घटी. एक सांझा सेल में बंद 17 विचारणाधीन कैदियों ने अचानक स्वास्थ्य खराब होने और पेट दर्द का झूठा नाटक रचा.
जैसे ही ड्यूटी पर तैनात जेल के सुरक्षाकर्मियों ने मानवीयता और आपातकालीन स्थिति का भरोसा करके सेल का दरवाजा खोला, कैदियों ने उन पर जानलेवा हमला बोल दिया. इस अचानक हुए हमले और धक्का-मुक्की में तीन सुरक्षा अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए और सभी 17 कैदी जेल की सीमाओं को लांघकर फरार होने में कामयाब रहे.
घटना की जानकारी मिलते ही शासन-प्रशासन में हड़कंप मच गया. महानिदेशक (जेल) संदीप राय राठौर ने तत्काल संज्ञान लेते हुए घोर लापरवाही के आरोप में ड्यूटी पर तैनात 9 जेल गार्डों और अधिकारियों को निलंबित कर दिया. वहीं, पुलिस ने बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चलाकर 17 में से 13 फरार कैदियों को दबोच लिया है, जबकि बाकी 4 की तलाश के लिए ड्रोन और पड़ोसी राज्य केरल से सटी सीमा तक सघन जांच जारी है.
आज भी जेलों से कैसे भाग निकलते हैं कैदी?
तमिलनाडु की यह घटना केवल एक अकेली चूक नहीं है, बल्कि यह देश की कई जेलों में मौजूद उन ढांचागत और मानवीय खामियों की तरफ इशारा करती है, जिनका फायदा शातिर अपराधी उठाते हैं
-मानवीय संवेदनाओं और एसओपी (SOP) का उल्लंघन: जेल मैनुअल के अनुसार, रात के समय या आपातकालीन स्थिति में किसी सेल का दरवाजा खोलते समय विशेष सावधानियों और बैकअप बल का होना अनिवार्य है. लेकिन कैदी अक्सर ‘अचानक तबीयत बिगड़ने’, ‘हार्ट अटैक’ या ‘दौरे पड़ने’ का नाटक करते हैं, जिससे सुरक्षाकर्मी हड़बड़ी में सुरक्षा प्रोटोकॉल को भूल जाते हैं और यही चूक भारी पड़ती है.
-कर्मचारियों की कमी और काम का दबाव: देश की ज्यादातर जेलों में स्वीकृत पदों की तुलना में जेल वार्डन और सुरक्षाकर्मियों की भारी कमी है. रात के समय कम कर्मचारियों की मौजूदगी का फायदा उठाकर कैदी उन पर हावी हो जाते हैं.
-ओवरक्राउडिंग: भारतीय जेलों में विचारणाधीन कैदियों की संख्या क्षमता से कहीं अधिक है. थेक्कमपट्टी जेल में भी एक ही साझा सेल में 17 कैदियों को रखा गया था. जब बड़ी संख्या में कैदी एक साथ एकजुट होकर हमला करते हैं, तो 2-3 सुरक्षाकर्मियों के लिए उन्हें संभालना नामुमकिन हो जाता है.
-आंतरिक खुफिया तंत्र की नाकामी: 17 कैदियों ने एक साथ मिलकर भागने की साजिश रची होगी. इतने बड़े स्तर पर बनी योजना का जेल प्रशासन या खुफिया तंत्र को भनक तक न लगना सुरक्षा प्रणाली की बड़ी विफलता को दर्शाता है.
तमिलनाडु में गरमाई राजनीति और सियासी घमासान
थेक्कमपट्टी जेल ब्रेक के बाद तमिलनाडु का राजनीतिक माहौल पूरी तरह गरमा गया है और विपक्ष ने राज्य सरकार को निशाने पर ले लिया है. द्रमुक अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे सरकार की पूर्ण विफलता करार दिया. उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “राज्य में पिछले 30 वर्षों में ऐसा दुस्साहस कभी देखने को नहीं मिला. जब जेल के अंदर के कैदी ही इस तरह आसानी से भाग रहे हैं, तो आम जनता की रक्षा कौन करेगा?”
अन्नाद्रमुक के महासचिव के. पलानीस्वामी ने सरकार को घेरते हुए कहा कि जिस राज्य में जेल के भीतर कैदी सुरक्षाकर्मियों पर हमला कर भाग रहे हों, वहां सड़कों पर आम आदमी सुरक्षित कैसे रह सकता है? वहीं, बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने इसे प्रशासन की अयोग्यता और बदइंतजामी करार दिया.
जेल केवल अपराधियों को कैद रखने की जगह नहीं है, बल्कि यह राज्य के कानून-व्यवस्था की साख का प्रतीक है. तमिलनाडु की घटना यह स्पष्ट करती है कि जब तक जेलों में कर्मचारियों की पर्याप्त भर्ती नहीं होगी, एसओपी का सख्ती से पालन नहीं कराया जाएगा और बैरकों में क्षमता से अधिक कैदियों को रखने की समस्या का समाधान नहीं होगा तब तक कैदी सुरक्षा तंत्र की इन्हीं मानवीय और ढांचागत कमियों का फायदा उठाकर भागते रहेंगे.