Explained: SC बोला- बिना कानूनी प्रक्रिया के हिरासत नहीं! समझिए अनुच्छेद 19 और 21 में क्या अधिकार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 यह घोषणा करता है कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा तय प्रक्रिया के अलावा उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा.

 

 

 

गिरफ्तारी के समय क्या अधिकार हैं

इस वक्त देश की राजधानी दिल्ली प्रदर्शन, विरोध और पुलिस द्वारा आम नागरिकों को हिरासत में लेने के लिए न सिर्फ भारत बल्कि दुनियाभर में चर्चा में है. SIR के विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष, छात्र संगठन और जनता सड़कों पर है. कई जगहों पर उनको ‘गैर संवैधानिक’ तरीकों से हिरासत में लिए जाने की बात कही जा रही है. अब सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने भी पुलिस से साफ शब्दों में कहा है कि दिल्ली में शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों को “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” के बिना हिरासत में नहीं लिया जा सकता.

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लेने, आने-जाने पर रोक लगाने और इंटरनेट सेवाएं बंद करने के आरोपों के बीच जारी यह निर्देश एक बहुत ही गंभीर और बुनियादी संवैधानिक सवाल खड़ा करता है. क्या राज्य सिर्फ ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ का हवाला देकर नागरिकों की व्यक्तिगत आजादी पर रोक लगा सकता है, या ऐसी हर रोक को कानूनी और संवैधानिक जांच की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरना होगा?

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विशेष बेंच के निर्देश और अंतरिम राहत

रविवार को कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की एक विशेष बेंच ने कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए. अदालत ने स्पष्ट किया कि मेट्रो और रेलवे सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए ताकि आम जनजीवन बाधित न हो. कानून के मुताबिक इंटरनेट कनेक्टिविटी में कोई भी अनावश्यक रुकावट नहीं आनी चाहिए. कानून के दायरे में रहते हुए नागरिकों को स्वतंत्र रूप से आने-जाने की आज़ादी मिलनी चाहिए.

हालांकि अदालत ने अभी तक प्रत्येक हिरासत की वैधता या अधिकारियों के खिलाफ अवमानना के आरोपों पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 21 पर अदालत का विशेष जोर एक ऐसे सिद्धांत को सामने लाता है जिसका अर्थ स्वतंत्रता प्राप्ति और संविधान लागू होने के बाद से काफी बदल चुका है.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 यह घोषणा करता है

“किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा तय प्रक्रिया के अलावा उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा.”

यह सुरक्षा देश के प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त है, न कि केवल नागरिकों को. इसका मुख्य उद्देश्य राज्य को बिना किसी पुख्ता कानूनी अधिकार और निर्धारित प्रक्रिया के किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत आज़ादी या जीवन पर अंकुश लगाने से रोकना है.

‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ बनाम ‘कानून की उचित प्रक्रिया’ क्या है

भारतीय संविधान बनाते समय इस बात पर लंबी बहस हुई थी कि नागरिकों की आज़ादी की रक्षा कैसे की जाए. इसके लिए दो तरह के विचार सामने थे.

कानून की उचित प्रक्रिया: यह अमेरिकी मॉडल है. इसका मतलब है कि अदालतें केवल यह नहीं देखेंगी कि पुलिस/सरकार नियम मान रही है या नहीं, बल्कि यह भी देखेंगी कि कानून खुद सही और न्यायसंगत है या नहीं. अगर कानून ही मनमाना हुआ, तो कोर्ट उसे रद्द कर देगा.

कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया : यह जापानी मॉडल (1946) है. इसका सीधा अर्थ है कि यदि संसद ने बहुमत से कोई नियम या कानून बना दिया है और सरकार बस उस नियम का पालन कर रही है, तो उसे सही मान लिया जाएगा.

संविधान निर्माताओं को डर था कि ड्यू प्रोसेस से बिना चुने हुए जजों को अत्यधिक शक्ति मिल जाएगी, जबकि “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” से सरकार मनमानी कर सकती है. अंततः, उन्होंने अधिक स्पष्टता के लिए ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया‘ को संविधान के अनुच्छेद 21 में शामिल किया.

कोर्ट का रुख: एके गोपालन से मेनका गांधी तक का सफर

समय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान की व्याख्या को पूरी तरह बदल दिया. इसको समझने के लिए ए.के. गोपालन केस (1950) की बात करनी जरूरी है. शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर संसद ने कोई कानून बना दिया है, तो कोर्ट उसकी अच्छाई या बुराई की जांच नहीं करेगा. यानी सरकार केवल कानून का हवाला देकर किसी की आज़ादी सीमित कर सकती थी.

फिर मेनका गांधी केस (1978) में जब सरकार ने बिना ठोस वजह बताए मेनका गांधी का पासपोर्ट ज़ब्त किया, तो सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख बदल दिया. कोर्ट ने कहा कि किसी की आज़ादी छीनने वाली प्रक्रिया केवल कागजी कानून नहीं होनी चाहिए, बल्कि वह “सही, न्यायपूर्ण और निष्पक्ष” होनी चाहिए.

इस फैसले ने भारत में अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी ‘ड्यू प्रोसेस’ के सिद्धांतों को लागू कर दिया. अब कानून सिर्फ बना होना काफी नहीं है, उसका न्यायसंगत होना भी जरूरी है.

गिरफ्तारी और नागरिक सुरक्षा अधिकार (अनुच्छेद 22)

अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) को हमेशा अनुच्छेद 22 के साथ पढ़ा जाता है, जो गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को कुछ बुनियादी अधिकार देता है जैसे गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार, अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार, 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने का अधिकार आदि.

जोगिंदर कुमार केस (1994) में कोर्ट ने साफ कहा कि पुलिस के पास केवल ‘अधिकार’ होने का मतलब यह नहीं कि वह हर मामले में गिरफ्तारी करे. गिरफ्तारी केवल बहुत जरूरी होने पर ही होनी चाहिए.

वहीं, डी.के. बसु केस (1997) में कोर्ट ने गिरफ्तारी के कड़े नियम बनाए जैसे मेमो बनाना, परिवार को सूचना देना और मेडिकल जांच कराना. इसका मकसद हिरासत में पुलिस की मनमानी को रोकना था.

विरोध प्रदर्शन और ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ का हवाला

संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध करने की आजादी देता है. अनुच्छेद 19(1)(a) बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 19(1)(b) बिना हथियारों के शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने का अधिकार देती है.

सरकार ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ या सुरक्षा के नाम पर इन पर वाजिब पाबंदियां लगा सकती है, लेकिन, कोर्ट का कहना है कि सरकार सिर्फ ‘सुरक्षा’ का नाम लेकर हर विरोध को नहीं दबा सकती. पुलिस की हर कार्रवाई को यह साबित करना होगा कि वह कानून के दायरे में और जरूरत के अनुपात में थी.

एडीएम जबलपुर केस और आपातकाल का सबक

एडीएम जबलपुर केस (1976) में हुआ था. आपातकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट के बहुमत ने कह दिया था कि नागरिक आपातकाल में अपनी आज़ादी के लिए कोर्ट नहीं जा सकते. उस समय केवल जस्टिस एच.आर. खन्ना ने इसके खिलाफ असहमति जताई थी.

फिर पुट्टास्वामी केस (2017) में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी पुरानी गलती सुधारते हुए माना कि 1976 का फैसला पूरी तरह गलत था. कोर्ट ने फिर से दोहराया कि नागरिकों का जीवन और उनकी स्वतंत्रता सरकार की दया पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन की बुनियाद है.

“कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सरकार या पुलिस अपनी मनमर्जी चला सके. सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना निश्चित रूप से राज्य का काम है, लेकिन नागरिकों की व्यक्तिगत आज़ादी की रक्षा करना संविधान का मूल संकल्प है. जब भी राज्य किसी नागरिक की आज़ादी छीनता है, तो उसे साबित करना होगा कि उसकी कार्रवाई मनमानी नहीं, बल्कि पूरी तरह न्यायसंगत और संवैधानिक है.

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