चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक दशक बाद अमेरिका पहुंचे हैं। यहां पिछले 6 महीने में दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से उनकी सीधी बातचीत होनी है। इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। इसकी वजह यह है कि वॉशिंगटन में हो रहा उच्चस्तरीय शिखर सम्मेलन सिर्फ दो महाशक्तियों के रिश्तों तक सीमित नहीं रहने वाला है। इस बातचीत में तय होने वाले फैसले का सीधा असर कई देशों के आर्थिक और रणनीतिक भविष्य पर पड़ने वाला है। चाहे वे फैसले टैरिफ से जुड़े हों, या रेयर अर्थ, एआई, सेमीकंडक्टर ग्लोबल सप्लाई चेन से, भारत पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा। आइए समझते हैं कैसे।
अमेरिका भारत के लिए निर्यात का सबसे बड़ा बाजार और सबसे बड़ा तकनीकी साझेदार है। वहीं चीन भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और रसायनों के लिए। ऐसे में ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच अगर कोई समझौता होता है, तो भारत के लिए एक तरफ नए अवसर खुल सकते हैं। हालांकि दूसरी तरफ कुछ बड़ी चुनौतियां भी खड़ी होंगी।
अगर ट्रंप और शी के बीच एक समझौता हो जाता है और वैश्विक कंपनियों का चीन पर विश्वास बहाल होता है, तो MNCs द्वारा अपनी मैन्युफैक्चरिंग को चीन से भारत ट्रांसफर करने की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। चीन के पास पहले से ही विशाल पैमाने और कम लागत का जो फायदा है, इसकी वजह से भारतीय कंपनियों के लिए चीनी सप्लायर्स को तुरंत हटाना मुश्किल होगा। वहीं अगर भारत अपने घरेलू ‘रेयर अर्थ’ और क्रिटिकल कंपोनेंट्स का उत्पादन बढ़ाए बिना केवल आयात पर निर्भर रहता है, तो भविष्य में चीन के लिए गए किसी भी अचानक फैसले से भारतीय EV, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उद्योग संकट में आ सकते हैं।
ट्रंप-शी मुलाकात के बाद भारत की असली रणनीति वॉशिंगटन या बीजिंग में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि दोनों महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का फायदा उठाकर आत्मनिर्भरता बढ़ाने की होनी चाहिए। भारत को ऐसी स्थिति बनाने की जरूरत है जहां भारत खुद को इतना प्रतिस्पर्धी बनाए कि दुनिया की कंपनियां चीन-अमेरिका सहयोग के बावजूद भारत में निवेश करना पसंद करें।
