हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न केवल राज्य की राजनीति में 15 साल बाद सत्ता परिवर्तन करवाया है बल्कि सियासी मानचित्र पर भी बड़ा उलटफेर किया है। खासकर बांग्लादेश की सीमा से सटे सभी 44 विधानसभा क्षेत्रों में इस चुनाव में एक ‘खामोश बदलाव’ देखने को मिला है। आंकड़े बताते हैं कि इन 44 में से 28 विधानसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जीत दर्ज कर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सबसे सुरक्षित किले को ढहा दिया है। पांच साल पहले यानी 2021 के चुनावों में भाजपा ने इन 44 सीमावर्ती सीटों में से केवल 17 पर जीत हासिल की थी, जिसका आंकड़ा अब बढ़कर 28 हो गया है, जो 63 फीसदी होता है।

यानी पांच सालों में भाजपा ने न केवल अपनी पुरानी सीटें बरकरार रखीं, बल्कि ममता बनर्जी की पार्टी TMC से 11 अतिरिक्त सीटें भी छीन लीं। दूसरी ओर, TMC की स्थिति यहाँ काफी कमजोर हुई है। 2021 में इन सीटों पर TMC का दबदबा था। उसने तब 27 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार उसकी संख्या लगभग आधी होकर मात्र 15 रह गई है। बाकी बची एक सीट, रानीनगर, कांग्रेस के खाते में चली गई है।

ये 44 विधानसभा क्षेत्र कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना जिलों में फैले हुए हैं। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ मुस्लिम आबादी काफी ज्यादा है। सीमावर्ती सीटों से TMC के 15 विधायकों में से 11 मुस्लिम ही हैं। कांग्रेस के रानीनगर से जीतने वाले विधायक जुल्फिकार अली भी मुस्लिम हैं। उन्होंने TMC के निवर्तमान विधायक अब्दुल सौमिक हुसैन को 2,701 वोटों के मामूली अंतर से हराया है। दूसरी ओर, BJP ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा का “घुसपैठ विरोधी” अभियान बांग्लादेश से सटे इलाकों की राजनीति में निर्णायक साबित हुआ है?

विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा की इस जीत के पीछे न सिर्फ उसका अवैध घुसपैठिए का मुद्दा और उस पर आक्रामक विरोधी रुख रहा बल्कि एक ‘खामोश जनसांख्यिकीय आक्रमण’ (silent demographic invasion) का नैरेटिव भी है। यानी सीमाई क्षेत्र की आबादी का एक बड़ा हिस्सा चुपचाप अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर आक्रामक होकर भाजपा के पक्ष में लामबंद हुआ है। पिछले कई सालों से, बांग्लादेश से कथित घुसपैठ BJP के चुनाव प्रचार का एक अहम मुद्दा रहा है। लिहाजा, भाजपा ने भी चुनाव प्रचार के दौरान घुसपैठ को लेकर ‘जीरो-टॉलरेंस’ की नीति अपनाने और “डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट” मॉडल लागू करने का वादा किया था। यानी घुसपैठियों की पहचान करने, उन्हें हटाने और वापस भेजने का वादा किया था। इसके अलावा, पार्टी ने सरकार बनने के 45 दिनों के भीतर भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने (fencing) के काम में तेजी लाने का संकल्प भी लिया था, जिसे आज (सोमवार, 11 मई को) शुभेंदु अधिकारी की पहली कैबिनेट बैठक में मंजूरी दे दी गई है।

भाजपा की पकड़ इन संवेदनशील क्षेत्रों में कितनी मजबूत हुई है, इसका अंदाजा जीत के अंतर से भी लगाया जा सकता है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, इन 28 सीटों पर भाजपा की जीत का औसत अंतर 40,195 वोट रहा, जो 2021 के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है। खासकर जिन 17 सीटों को भाजपा ने बरकरार रखा है, वहाँ जीत का अंतर तीन गुना बढ़कर औसत 50,440 वोट तक पहुँच गया है। इसके ठीक उलटTMC की जीत का औसत अंतर आधा होकर 28,504 वोट रह गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीमा क्षेत्रों में BJP की सफलता के पीछे सुरक्षा का मुद्दा, पहचान की राजनीति और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण बड़ी वजह रहे हैं। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम बहुल इन सीटों पर भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा था, जबकि TMC के 15 विजयी विधायकों में से 11 मुस्लिम हैं। कांग्रेस के एकमात्र विजयी उम्मीदवार ज़ुल्फ़िकार अली भी इसी समुदाय से आते हैं। यह बदलाव तृणमूल कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है। ममता बनर्जी पर जिस मुस्लिम आबादी के हितों की रक्षा करने का आरोप लगता है, वह भी अब उनके लिए सुरक्षित नहीं रहा है।

बता दें कि भारत और बांग्लादेश के बीच पश्चिम बंगाल में 2,216 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसमें से लगभग 563 किलोमीटर हिस्सा अभी भी बिना बाड़ के है। भाजपा की इस बड़ी जीत ने स्पष्ट कर दिया है कि सीमावर्ती क्षेत्रों के मतदाताओं के लिए सुरक्षा और घुसपैठ जैसे मुद्दे इस चुनाव में निर्णायक साबित हुए हैं। हालांकि आगे भी सवाल जारी हैं कि क्या क्या “घुसपैठ” का नैरेटिव BJP को लंबे समय तक राजनीतिक बढ़त देता रहेगा, या यह सिर्फ चुनावी लहर थी?

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