परशुराम में ब्राह्मण‑तपस्विता और क्षत्रिय‑पराक्रम का अद्भुत समन्वय है, वे तपस्वी ऋषि हैं,किंतु फरसा और धनुष धारण कर युद्ध भी करते हैं।यह दोहरा गुण‑संमिश्रण उन्हें एक अलौकिक योद्धा की संज्ञा देता है। वे न केवल उग्र योद्धा हैं, न केवल शांत तपस्वी, बल्कि “धर्म, क्रोध और विनम्रता,दया दान करने वाले राम के छठे आवेश अवतार हैं।
“रामो रामश्च रामश्च परशुरामस्तथापरः।
एते विष्णोः प्रकीर्तिता अवतारा महाबलाः”
वे समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संतुलन की पुनर्स्थापना के प्रतीक हैं, जिन्होंने अन्याय, अत्याचार और सामाजिक असंतुलन के विरुद्ध संघर्ष कर धर्म की पुनर्स्थापना और समाज में शान्ति स्थापना का पावन पुनीत कार्य किया है।परशुराम जी का जन्म महर्षि यमदग्नि,(ब्रह्मा ,ऋचीक भृगु फिर यमदग्नि यह है वंशावली) और माता रेणुका के यहाँ हुआ। वे ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए, किंतु उनका जीवन एक योद्धा के रूप में व्यतीत हुआ। उनका नाम “परशुराम” इसलिए पड़ा क्योंकि वे सदैव परशु (फरसा) धारण करते थे। परशुराम का जन्म इंदौर के जनापाव पहाड़ी इंदौर में बताया जाता है और कुछ विद्वानों ने इसे बलिया से भी जोड़ा है और बहुत सारे लोग इसे जौनपुर से भी जोड़ते हैं परंतु मूलतः अब तक जो प्रमाण है और इस समय जहां लगभग 10 करोड रुपए की लागत से जो मंदिर बन रहा है वह इंदौर के पास जनापाव आश्रम ही है।


परशुराम के पौरुष की कहानी सहस्त्रार्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) के साथ संघर्ष से जुड़ी है, जो अपने अहंकार और शक्ति के बल पर ऋषियों और नागरिकों पर अत्याचार करता रहा।जब उसने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी, तब परशुराम जी ने प्रतिशोध स्वरूप उसे और उसके जैसे अन्य अत्याचारी हैहय बंशीय क्षत्रियों का संहार कर दिया था। उनका यह संहार उसके विरुद्ध था जो तत्कालीन समय में ऋषियों मनीषियों,नागरिको को परेशान करते था।यह केवल पिता के प्रतिशोध का युद्ध नहीं था बल्कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और धर्म की स्थापना का प्रतीक का भी था।
परशुराम जी का जीवन केवल युद्ध और विनाश तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें गहरे सामाजिक सुधार के तत्व भी निहित हैं। उस समय समाज में सत्ता का केंद्रीकरण कुछ ही वर्गों के हाथों में हो गया था,जो मनमाना कार्य करते थे,जिससे समाज में असंतुलन उत्पन्न हो गया था,अन्य वर्ग सब डर गए थे,व्यवस्थाएं डांवाडोल हो गयी थी,तब परशुराम जी ने इस असंतुलन को समाप्त कर समाज में समानता और न्याय की स्थापना का प्रयास 21 बार में किया।
चूंकि वे भगवान के अवतार थे इसलिए जब भी कोई वर्ग अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है, तब उसे नियंत्रित करना भगवान के लिए आवश्यक हो जाता है वही परशुराम ने किया। जैसा कि आज के लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप सत्ता परिवर्तन हम आप करते हैं वही कार्य उन्होंने भी किया।वे स्वयं सदा तपस्वी ही बने रहे,पूरा सर्वस्व दान कर देते थे,जिससे सत्ता का संतुलन और उत्तरदायित्व सदा सन्तुलित बना रहता था।

परशुराम जी को अक्सर एक क्रोधी और युद्धप्रिय ऋषि के रूप में देखा जाता है, किंतु यह दृष्टिकोण अधूरा है। वास्तव में, उनका उद्देश्य समाज में संतुलन और सामंजस्य स्थापित करना था। उन्होंने न केवल अत्याचारियों का दमन किया, बल्कि बाद में तपस्या और ज्ञान के तीनोलोक में उनके समान कोई शस्त्र-शास्त्र का विद्वान नहीं था,वही भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण के गुरु बनकर तत्कालीन समाज को दिशा दिए।वे महाभारत और रामायण दोनों में उल्लेखित हैं,जो यह दर्शाता है कि उनका प्रभाव विभिन्न युगों तक बना रहा।इससे यह स्पष्ट होता है कि वे केवल विनाशक नहीं, बल्कि ज्ञान और शस्त्र विद्या के संरक्षक भी थे।
आज के समय में परशुराम जी का जीवन हमें कई महत्वपूर्ण संदेश देता है। पहला, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना आवश्यक है, चाहे वह किसी भी रूप में हो किसी के साथ हो। दूसरा, शक्ति का प्रयोग केवल रक्षा और न्याय के लिए होना चाहिए,न कि व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए। तीसरा,समाज में संतुलन और सामंजस्य बनाए रखना हर व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है। परशुराम जी यह सिखाते हैं कि परिवर्तन केवल संघर्ष से नहीं, बल्कि आत्मसंयम, ज्ञान और संतुलन,त्याग और असीम तपस्या से ही संभव है। उनका जीवन यह दर्शाता है कि कठोरता और करुणा,शस्त्र और शास्त्र, दोनों का संतुलन सदा बना रहे। आज उनकी जयंती पर उनको शत सहस्त्र बार बार प्रणाम।

प्रोफे आर एन त्रिपाठी
पूर्व सदस्य- उप्र लोकसेवा आयोग।
प्रोफेसर-समाजशास्त्र विभाग काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी

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