अमेरिका की तरफ से जहाज कब्जे में लिए जाने के चलते ईरान नाराज है। खबर है कि इस संबंध में ईरान ने पाकिस्तान से बात की है और अमेरिका की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई है। खास बात है कि ईरान इससे पहले ही इस्लामाबाद में होने वाली दूसरे दौर की बातचीत से दूरी बनाने के संकेत दे रहा है। अब तक यह साफ नहीं है कि ईरानी प्रतिनिधि पाकिस्तान जाएंगे या नहीं। इधर, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वार्ता के लिए अपनी टीम भेजने का घोषणा पहले ही कर दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से बात की है। पेजेश्कियान ने अमेरिका की कार्रवाई को दादागिरी और मनमाना रवैया करार दिया है। साथ ही उन्होंने पाकिस्तानी पीएम से कहा है कि इस घटना ने संदेह बढ़ा दिया है कि अमेरिका पुरानी हरकतें दोहराएगा और ‘कूटनीति के साथ विश्वासघात’ करेगा।

अमेरिका ने ईरान के ध्वज वाले जहाज के खिलाफ कार्रवाई की थी और अपने नियंत्रण में ले लिया था। अब अमेरिकी CENTOM ने ईरान के मालवाहक जहाज तूस्का के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी दी है। सेंट्रल कमांड ने कहा, ‘छह घंटे की अवधि में बार-बार दी गई चेतावनियों के बावजूद, जब तूस्का के चालक दल ने पालन नहीं किया, तो स्पूरांस ने पोत को अपने इंजन कक्ष को खाली करने का निर्देश दिया। स्पूरांस ने पोत की 5-इंच एमके 45 तोप से तूस्का के इंजन कक्ष में कई गोले दागकर प्रोपल्शन को बंद कर दिया।’ सेंटकॉम ने बताया कि ईरानी पोत अभी अमेरिका के नियंत्रण में है।

13 अप्रैल को अमेरिकी नौसेना ने होर्मुज जलमार्ग के दोनों ओर स्थित ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले सभी समुद्री यातायात की नाकाबंदी शुरू कर दी। यह स्ट्रेट दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और एलएनजी सप्लाई का रास्ता है। वॉशिंगटन का कहना है कि गैर-ईरानी जहाज होर्मुज से तब तक स्वतंत्र रूप से गुजर सकते हैं जब तक वे तेहरान को कोई शुल्क नहीं देते। ईरानी अधिकारियों ने शुल्क लगाने की घोषणा नहीं की है, लेकिन ऐसी योजनाओं पर चर्चा की है।

खबरें हैं कि तूस्का को कब्जे में लिए जाने के बाद अब ईरान ने ओमान सागर में अमेरिका के जहाजों पर ड्रोन अटैक कर दिए हैं। पहले ही ईरान ने कार्रवाई की चेतावनी दे दी थी। वहीं, इस्लामिक रिपब्लिक न्यूज एजेंसी का कहना है कि पाकिस्तान में दूसरे दौर की वार्ता की खबरें झूठी हैं। एजेंसी ने कहा था, अमेरिका की ‘जरूरत से ज्यादा मांगें, अनुचित और अवास्तविक उम्मीदें, लगातार विरोधाभास, और तथाकथित नौसैनिक नाकाबंदी जो युद्धविराम की समझ का उल्लंघन करती है, साथ ही धमकी भरी बयानबाजी ने अब तक बातचीत की प्रगति में बाधा डाली है।’

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