
कुलपति प्रो. डॉ. हिमांशु ऐरन ने शोध कार्यों को बौद्धिक संपदा से सुरक्षित करने पर दिया बल; यूकॉस्ट के संयुक्त निदेशक डॉ. डी.पी. उनियाल बोले – “आईपीआर वैज्ञानिक शोध को पहचान और संरक्षण देने का सबसे प्रभावी माध्यम है”
विजडम इंडिया संवाददाता।
देहरादून। रास बिहारी बोस सुभारती विश्वविद्यालय, देहरादून में “बौद्धिक संपदा अधिकार आईपीआर जागरूकता” Intellectual Property Rights Awareness विषय पर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य शोध कार्यों को उद्योग तथा स्वास्थ्य एवं वेलनेस क्षेत्र से जोड़ने के साथ-साथ बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना था। यह कार्यशाला उत्तराखंड स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी UCOST के सहयोग से आयोजित की गई।

कार्यशाला सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स की अवधारणा के अनुरूप आयोजित की गई, जिसका उद्देश्य वैज्ञानिक शोध को समाज, उद्योग और स्वास्थ्य क्षेत्र के व्यावहारिक उपयोग से जोड़ना है। इसी परिप्रेक्ष्य में कार्यशाला का विषय “प्रयोगशाला में विकसित शोध परिणामों को औद्योगिक तथा स्वास्थ्य एवं वेलनेस क्षेत्रों से जुड़े व्यावहारिक अनुप्रयोगों में रूपांतरित करना” रखा गया।

कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों के स्वागत और पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुई।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. हिमांशु ऐरन ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में शोध कार्यों को पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकारों के माध्यम से सुरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को आईपीआर के प्रति जागरूक करने के लिए समय-समय पर ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिससे उनका शोध कार्य व्यापक स्तर पर उपयोगी बन सके।
मुख्य वक्ता यूकॉस्ट के संयुक्त निदेशक डॉ. डी.पी. उनियाल ने मुख्य वक्ता के रूप में कहा, “बौद्धिक संपदा अधिकार किसी भी वैज्ञानिक शोध को पहचान और संरक्षण प्रदान करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि शोध को उचित कानूनी सुरक्षा मिले तो वह उद्योग, समाज और अर्थव्यवस्था के विकास में बड़ी भूमिका निभा सकता है।”

कार्यशाला में वरिष्ठ वैज्ञानिक / विशेषज्ञ डॉ. राज कुमार सिंह ने बायोडीजल के विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के क्षेत्र में शोध को पेटेंट और आईपीआर के माध्यम से संरक्षित करना आवश्यक है, ताकि ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों को बढ़ावा मिल सके।
आयुर्वेद एवं मर्म चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. शिशिर प्रसाद ने मर्म चिकित्सा पर अपने विचार रखते हुए कहा कि पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियों से जुड़े ज्ञान और शोध को भी बौद्धिक संपदा अधिकारों के माध्यम से सुरक्षित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

कार्यक्रम के दौरान विशिष्ट अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को कार्यशाला किट वितरित की गई तथा विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञों ने बौद्धिक संपदा अधिकारों, पेटेंट प्रक्रिया और शोध के व्यावहारिक उपयोग पर विस्तार से जानकारी दी।
कार्यशाला के सफल आयोजन में रास बिहारी बोस सुभारती विश्वविद्यालय की आयोजन समिति के सदस्य डॉ. संदीप ध्यानी, डा पुष्पा ध्यानी,डॉ. प्रतिभा जुयाल, श्री सूरज सिंह, श्री नवीन फेगवाल, श्री प्रदीप महारा, एनएसएस इंचार्ज और डॉ वंदना हल्दवान का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
