बिहार के बाद भले ही भाजपा की नजर पश्चिम बंगाल पर हो, लेकिन भाजपा ने मिशन-2027 की तैयारी भी शुरू कर दी है। पार्टी ने अपने सामाजिक समीकरण दुरुस्त करने के लिए पंकज चौधरी के रूप में कुर्मी चेहरे को यूपी की कमान सौंपी है लेकिन भाजपा के लिए क्षेत्रीय संतुलन साधने की बड़ी चुनौती है। सरकार के मोर्चे पर पहले से भारी पूर्वी यूपी का पलड़ा अब संगठन में भी भारी हो चुका है। ऐसे में अब सबकी निगाहें योगी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार पर टिकीं हैं।

साल 2009 में यूपी में महज 10 सीटें जीतने वाली भाजपा ने अगले ही लोकसभा चुनाव यानि 2014 में 80 में से 73 सीटें जीत ली थीं। इसमें दो सीटें सहयोगी अपना दल की भी थीं। 2019 में यह संख्या 62 रही। लेकिन 2024 में पार्टी महज 33 सीटों पर सिमट गई। चुनाव परिणाम सिर्फ पूरब ही नहीं पश्चिम में भी प्रतिकूल रहे। दरअसल, भाजपा ने संगठनात्मक दृष्टि से प्रदेश को छह क्षेत्रों में बांट रखा है।

भाजपा ने पश्चिम में पांच सीटें जीतीं। इनमें मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर, गौतमबुद्धनगर और अमरोहा सीटें शामिल हैं जबकि 2019 में उसने पश्चिम की कैराना व मुजफ्फरनगर सीटें भी जीती थीं। हालांकि दो सीटें बागपत व बिजनौर एनडीए में शामिल हुए रालोद ने भी जीती थीं। वहीं 2014 में भाजपा पश्चिम में संभल और रामपुर के अलावा सहारनपुर सीटें भी जीती थीं। रुहेलखंड क्षेत्र में भी भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा। 2019 में जीती गईं नौ सीटों की तुलना में 2024 में संख्या चार ही रह गई। ब्रज में भी फिरोजाबाद, बदायूं जैसी सीटें पार्टी हार गई जबकि बुंदेलखंड में 2019 में जीतीं पांचों सीटों में से 2024 में सिर्फ एक ही सीट जीत सकी।

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