
प्रो. अजय द्विवेदी, शिक्षाविद
भारत आज तीव्र आर्थिक प्रगति के साथ दुनिया में नई पहचान बना रहा है। सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जीडीपी के बढ़ते आंकड़े यह संकेत देते हैं कि हमारा राष्ट्र सही दिशा में अग्रसर है। परंतु विकास का यह चेहरा केवल उतना नहीं है, जितना यह संख्याएँ हमें दिखाती हैं। क्या किसी राष्ट्र की समग्र उन्नति केवल इस बात से परिभाषित हो सकती है कि वहाँ कितना उत्पादन हो रहा है, कितना निवेश आ रहा है और कितनी आय उत्पन्न हो रही है। निश्चित ही उत्तर ‘नहीं’ है। मानव जीवन का अर्थ केवल उपभोग और कमाई भर तो नहीं होता। नागरिकों के स्वस्थ मन, सुरक्षित समाज, संतुलित पर्यावरण, सौहार्दपूर्ण परिवार, और संतोष से भरे हृदय के बिना विकास अधूरा है। यही वह क्षण है जब भारत को जीडीपी से आगे बढ़कर खुशहाली के वास्तविक मापदंडों पर ध्यान देना होगा।
दुनिया के कई देश यह समझ चुके हैं कि आर्थिक विकास की सफलता का आकलन मनुष्य की मुस्कुराहट से होना चाहिए, न कि केवल उसके जेब में पड़ी राशि से। भूटान जैसे देश ने विकास का सूचकांक ही बदल दिया और सकल राष्ट्रीय खुशहाली अर्थात ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस को राष्ट्र की उन्नति का आधार बनाया। इस अवधारणा में न केवल आर्थिक प्रगति बल्कि मानसिक संतोष, सामाजिक सहयोग, पारिवारिक मजबूती, सांस्कृतिक संरक्षण, सुशासन और पर्यावरण की रक्षा को भी समान महत्व दिया गया है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन अर्थात ओईसीडी द्वारा बनाया गया बेहतर जीवन सूचकांक यह स्पष्ट करता है कि विकसित राष्ट्र वही है जहाँ नागरिकों को सम्मानजनक जीवन, सुरक्षित परिवेश और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा-सुविधाएँ प्राप्त हों। संयुक्त राष्ट्र का विश्व खुशहाली प्रतिवेदन भी यही बताता है कि नागरिकों की प्रसन्नता, भरोसा, अवसर और जीवन की सहजता ही असल प्रगति है।
भारत में विकास की यात्रा अब तक तेज आर्थिक गति पर केंद्रित रही है, परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि आधुनिक जीवन ने लोगों के भीतर चिंताओं, तनावों और भय का नया संसार भी रच दिया है। आज एक ओर शहरों में बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो रही हैं, तो दूसरी ओर इन्हीं इमारतों में अकेलापन भी तेजी से ऊँचा हो रहा है। युवा वर्ग उच्च वेतन और आधुनिक सुविधाओं के बावजूद मानसिक दबावों से जूझ रहा है। बेहतर नौकरी की दौड़, प्रतियोगी परीक्षाओं का तनाव, असुरक्षा की भावना, सामाजिक तुलना और भविष्य की अनिश्चितता उसकी खुशियों को भीतर ही भीतर खा जाती है। महानगरों की चकाचौंध के पीछे छुपी यह कड़वी सच्चाई है कि बातचीत और रिश्तों के लिए समय नहीं है, भावनाओं के लिए स्थान नहीं है और असफलता के लिए समाज के पास धैर्य नहीं है। कई बार यही दबाव अवसाद, अनिद्रा, और आत्महत्या जैसी त्रासदियों में रूपांतरित हो जाता है। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में युवा रोजगार और पहचान की तलाश में अपने घर, खेत और मिट्टी से दूर होते जाते हैं, जिससे पारिवारिक और सामुदायिक जीवन धीरे-धीरे बिखरने लगता है। यह स्थिति विकास के अर्थ पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
भारत की संस्कृति यह सिखाती है कि विकास का लक्ष्य केवल कौशल और कमाई नहीं, बल्कि संतोष और सहयोग है। इसलिए समय की माँग है कि हम भारत की अर्थव्यवस्था को केवल लाभ-संचालित न रखकर जन-संचालित बनाएं। राष्ट्र तभी प्रगतिशील कहा जाएगा जब नागरिक शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हों, समाज में समानता और न्याय उपलब्ध हो, परिवार सुरक्षित हों, युवाओं को अवसर मिले, पर्यावरण संरक्षित रहे और जीवन में उद्देश्य तथा आनंद बना रहे। इन सभी सरोकारों को ध्यान में रखते हुए भारत अपना स्वयं का खुशहाली-आधारित भारतीय सूचकांक विकसित कर सकता है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, परिवारिक संबंध, भ्रष्टाचार-मुक्त शासन, पर्यावरणीय संतुलन, सांस्कृतिक गरिमा, डिजिटल गोपनीयता और लैंगिक सम्मान जैसे आयामों को उचित स्थान दिया जाए।
सरकार द्वारा संचालित कई योजनाएँ जैसे आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन, उज्ज्वला, स्वच्छता अभियान, महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम, मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित मनोदर्पण इत्यादि इसी नई दिशा की स्पष्ट झलक प्रस्तुत करते हैं। यदि इन योजनाओं को खुशहाल भारत के व्यापक दर्शन से जोड़ा जाए तो परिणाम और अधिक प्रभावी तथा स्थायी होंगे। भारतीय दर्शन में भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन की अवधारणा सदैव जीवित रही है। हमारे पर्व, परंपराएँ और मूल्य इसका प्रमाण हैं कि भारत की विकास-चेतना केवल धनोंपार्जन तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह मनुष्य की संपूर्ण उन्नति पर आधारित रही है।
इसलिए यह मान लेना समीचीन है कि भारत आर्थिक प्रगति के नए स्वर्णिम युग में प्रवेश कर चुका है, परंतु अब यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यह प्रगति मनुष्यता की बुनियादी जरूरतों और भावनात्मक आवश्यकताओं को भी स्पर्श करे। किसी भी राष्ट्र की असली शक्ति उसकी इमारतों और उद्योगों में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की चमकती आंखों और खिलती मुस्कानों में बसती है। भारत यदि जीडीपी के साथ-साथ खुशहाली को विकास का केंद्रीय लक्ष्य बनाता है, तो आने वाली पीढ़ियाँ गर्व से कहेंगी कि यह वही भारत है जहाँ विकास की नींव मनुष्य की खुशी पर रखी गई है, जहाँ प्रगति का अर्थ सुख-संतोष और जीवन की सहजता है, जहाँ हर नागरिक गर्व से कह सकता है कि वह न केवल विकसित राष्ट्र का नागरिक है, बल्कि एक खुशहाल राष्ट्र का भी।
