उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब खास तारीखों का जिक्र आएगा तो 4 जून 2024 की भी जरुर चर्चा होगी। इस दिन 18वीं लोकसभा चुनाव के नतीजे सामने आए थे। नतीजों से पहले आए एग्जिट पोल में सरकार में NDA की प्रचंड जीत के साथ वापसी का अनुमान लगाया गया था। एग्जिट पोल में उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सीटों में से बीजेपी को 60 से ज्यादा सीटे मिलती हुई दिखाई जा रही थीं। लेकिन असल में जब नतीजें सामने आए तो सारे एग्जिट पोल गलत साबित हुए। समाजवादी पार्टी, अकेले 37 सीटें जीतकर सूबे की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और 2019 में 62 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी महज 33 सीटों पर सिमट गई। इससे पहले राज्य में हुए दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की थी। 2024 में अखिलेश यादव के सामाजिक ताने- बाने में भारतीय जनता पार्टी फंसी हुई नजर आई।
वहीं 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव एक नया गणित बैठा रहे हैं। आइए जानते हैं , उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी कैसी सोशल इंजीनियरिंग पिच तैयार कर रही है।
लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी के यूपी में 37 सीटें जीतकर अपना अबतक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। इस जीत के बाद अखिलेश यादव के राजनीतिक कद की तुलना उनके पिता मुलायम सिंह यादव से भी की जाने लगी थी। सपा ने लोकसभा चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग पिच पर भाजपा को खुलकर खेलने का मौका नहीं दिया था। समाजवादी पार्टी ने इस चुनाव में सभी जातियों का ध्यान रखा और सबसे ज्यादा फोकस गैर यादव ओबीसी उम्मीदवारों पर किया।
2024 के चुनाव में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में अपने हिस्से आईं 62 में से सिर्फ 5 सीटों पर यादव और 4 सीटों पर मुसलमान उम्मीदवार उतारे। जबकि 17 दलित प्रत्याशियों को मैदान में उतारा। उन्होंने 9 सवर्ण और कुल 30 ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिया। नतीजों में सपा नें 37 सीटों पर जीत हासिल की। सपा की इस जीत में सबसे बड़ा योगदान ओबीसी मतदाताओं का रहा है। सपा के 37 सांसदों में से 20 ओबीसी के है।
कहते हें दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है…शायद ऐसा ही कुछ हाल अभी भाजपा का है। 2024 में उत्तर प्रदेश में लगे झटके के बाद भाजपा 2027 में काफी अलर्ट दिख रही है।
विधानसभा चुनाव को लेकर सपा, जो सोशल इंजीनियरिंग की पिच तैयार कर रही है, उससे भाजपा की चिंता बढ़ना लाजमी हैं। पिछले चुनाव ने गैर यादव ओबीसी, गैरजाटव दलित ने सपा और कांग्रेस की ओर झुकती हुई नजर आई थी। फिलहाल भाजपा के सामने उन्हें फिर से साधने की चुनौती है। लोकसभा के 2014, 2019 और बीते दो विधानसभा में भाजपा को इस वर्ग का साथ जमकर मिला था। इन जातियों के सहारे ही भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की थी।
उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव बेताब हैं। यही वजह है कि, 2024 में अपने विनिंग फार्मूले पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) में एक और वर्ग को भी जोड़ना चाहते हैं। विधानसभा चुनाव से पहले अपने सियासी समीकरण को मजबूत करने में जुटे अखिलेश, अपने विनिंग फार्मूले पीडीए के साथ अगड़ी जातियां खासकर ब्राह्मण को भी जोड़ना चाहते हैं। इसके साथ ही साथ सपा, मुस्लिम-यादव-दलित मतदाताओं को अपना बैकबोन बनाना चाहते हैं। जानकारी के मुताबिक, सपा कुछ ऐसी सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार खड़ा करने की है, जहां उसे मुस्लिम-यादव-दलित मतदाताओं का साथ मिले। बता दें कि, लोकसभा चुनाव में सपा ने यादव बिरादरी से महज पांच और मुस्लिम बिरादरी से महज चार उम्मीदवार मैदान में उतारे थे।
बता दें कि बीते चुनाव की बात करें तो सपा, सुभासपा और RLD गठबंधन ने करीब 128 यादव-मुस्लिम, इतने ही गैर यादव ओबीसी, 86 दलित व करीब 60 अगड़े उम्मीदवार उतारे थे। वहीं भाजपा गठबंधन ने गैरयादव ओबीसी को करीब 135, यादव बिरादरी के 15, अगड़ी जातियों के करीब 140, दलित बिरादरी के 85 उम्मीदवार उतारे थे।
समाजवादी पार्टी इस बात को बिल्कुल अच्छे से समझती है कि, चुनाव के नदजीत आते ही भाजपा योगी vs अखिलेश के मुद्दे को आगे करेगी। इस मुद्दे के साथ ही साथ बीजेपी हिन्दुत्व और लॉ एंड आर्डर के मुद्दे पर भी जमकर खेलेगी। इस सबसे बचने के लिए सपा अपने सोशल इंजीनियरिंग पिच को और मजबूत करना चाहेगी।
