यूपी की तेज तर्रार पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल ने इस्तीफा देने के बाद अब राजनीति में कदम रखेंगी। मंगलवार को उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर वीडियो पोस्ट कर सत्ता और सिस्टम पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने साफ कहा कि वह किसी राजनीतिक दल के साथ नहीं, बल्कि लोगों के साथ राजनीति करेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास न चुनावी राजनीति में इस्तेमाल होने वाला पैसा है, न बाहुबल और न ही जाति-धर्म का कोई समीकरण। ऐसे में वह लोगों को साथ जोड़कर राजनीति शुरू करना चाहती हैं।

बीते 30 अगस्त को आईएएस से अचानक इस्तीफा देकर दिव्या मित्तल ने हलचल मचा दी थी। सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने अपनी भावनाएं जाहिर की थीं। साथ ही अपने करियर में होने वाली घटनाओं को भी बताया था। अब 29 सितंबर को दिव्या मित्तल ने राजनीति में कदम रखने की बात कही। एक्स पर पोस्ट वीडियो में उन्होंने कहा, ‘पैसा नहीं है, बाहुबल नहीं है, यहां तक कि जाति धर्म का समीकरण भी तो नहीं है। लेकिन जो पैसा चुनाव में बहाया जाता है, वो कहां से आता है? वह सड़क से आता है, हमारे पुल से आता है, हमारे स्कूल से आता है। मुझे वह पैसा नहीं बहाना, मुझे वो सड़क ही चाहिए। ये बाहुबल जो जनता के ऊपर दिखाया जाता है, मुझे वो बाहुबल नहीं चाहिए। मुझे लोगों से बनी हुई वो शक्ति चाहिए जो लोगों के लिए हो और लोगों की ही हो। जाति धर्म का समीकरण इसलिए नहीं है क्योंकि मैंने कभी बैठाया नहीं। जब मैं अधिकारी थी तो न्याय करने से पहले मैंने कभी किसी का नाम नहीं पूछा। राजनीति में भी नहीं पूछूंगी। 80 सालों तक इन्होंने समीकरण ही तो बिठाए और साथ में देश भी बैठा रह गया। इस तरह की राजनीति कैसे शुरू होगी, कैसे खड़ी होगी और कैसे चलेगी, ये हम लोग साथ मिलकर तय करेंगे।’

दिव्या मित्तल ने सिस्टम पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि एक बार वह लहुड़ियाडीह की पहाड़ी पर पानी पहुंचाने के लिए निरीक्षण कर रही थीं। इसी दौरान एक महिला उनके पास आई। दिव्या मित्तल को लगा कि शायद वह पेंशन या पक्के मकान जैसी किसी जरूरत के लिए मदद मांगने आई होगी। लेकिन महिला ने उनसे अपने गांव में स्कूल बनवाने की मांग की। लेकिन महिला ने कहा, ‘मैडम, हमारे गांव में स्कूल सिर्फ पांचवीं कक्षा तक है। इसके बाद जंगल और पहाड़ के बीच बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है। मुझे अपने गांव में आगे की कक्षाओं के लिए स्कूल चाहिए।’

दिव्या मित्तल ने बताया कि उस समय तक उस महिला के घर में पानी तक नहीं था, लेकिन उसने स्कूल की मांग की। उन्होंने नियमों की जांच कर स्कूल को मंजूरी दे दी। लेकिन तीन साल बाद भी स्कूल नहीं बनना शुरू हुआ। क्या पैसा नहीं था, नियम नहीं था या स्वीकृति नहीं थी? बस इरादा नहीं था। अगर इरादा होता तो पहाड़ भी रास्ता दे देता और इरादा नहीं था तो एक फाइल ही पहाड़ बन गई।

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