दूरदर्शन केंद्र देहरादून के 26वें स्थापना दिवस पर सूफी और ग़ज़ल संगीत की शानदार प्रस्तुति, पिता की विरासत को बेटे शाहरुख खान ने भी बनाया अपना जुनून

देहरादून, 22 अगस्त। संगीत केवल सुरों और शब्दों का मेल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही साधना, संस्कार और विरासत भी है। जब कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है और फिर तीसरी पीढ़ी भी उसी साधना को अपना जीवन समर्पित कर देती है, तो वह केवल परिवार की परंपरा नहीं रहती, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत का रूप ले लेती है। ऐसी ही समृद्ध संगीत परंपरा की झलक दूरदर्शन केंद्र देहरादून के 26वें स्थापना दिवस पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या में देखने को मिली।

कार्यक्रम में प्रसिद्ध ग़ज़ल एवं सूफी गायक सनावर अली खान ने अपनी शानदार प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी आवाज में ग़ज़ल की नजाकत, सूफी संगीत की गहराई और भारतीय संगीत परंपरा की मिठास का खूबसूरत संगम दिखाई दिया। उन्होंने अपनी प्रस्तुतियों से सभागार को लंबे समय तक सुरों की दुनिया में बांधे रखा।

सनावर अली खान ने ग़ज़ल और सूफी संगीत की कई खूबसूरत प्रस्तुतियां दीं। उनकी प्रस्तुति के दौरान श्रोताओं ने तालियों से उनका उत्साह बढ़ाया। “धड़कता दिल के प्यार का मौसम गुजर गया” और “हम डूबने चले के दरिया उतर गया” जैसी प्रस्तुतियों ने सांस्कृतिक संध्या को विशेष बना दिया।

सनावर अली खान की संगीत साधना की एक खास बात यह है कि उन्होंने संगीत को केवल अपनी कला नहीं, बल्कि अपनी पारिवारिक विरासत के रूप में भी जिया है। उनके वालिद साहब जनाब मक़सूद हुसैन ख़ान साहब उनके पिता होने के साथ-साथ उनके गुरु भी थे। यह परिवार किराना घराने की समृद्ध संगीत परंपरा से जुड़ा हुआ है। संगीत के संस्कार उन्हें अपने पिता और गुरु मक़सूद हुसैन ख़ान साहब से मिले और उसी परंपरा को उन्होंने अपनी साधना के माध्यम से आगे बढ़ाया।

सनावर अली खान हिंदी, उर्दू, फारसी, अरबी, गढ़वाली, कश्मीरी और पंजाबी सहित विभिन्न भाषाओं में गायन और संगीत की प्रस्तुति देने की क्षमता रखते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर उन्होंने भारतीय संगीत की विविधता को व्यापक मंच तक पहुंचाया है।

अब तीसरी पीढ़ी भी उसी कला को समर्पित

इस संगीत परंपरा की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह केवल सनावर अली खान तक सीमित नहीं है। उनके पुत्र शाहरुख खान भी इसी कला परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। शाहरुख खान की कला भी अपने पिता की तरह प्रभावशाली और अप्रतिम है। वह देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में भी कई अवसरों पर अपनी कला की प्रस्तुतियां दे चुके हैं।

शाहरुख खान के रूप में इस परिवार की संगीत साधना अब तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है। एक पीढ़ी ने जिस कला को साधना और संस्कार के रूप में अपनाया, दूसरी पीढ़ी ने उसे अपनी पहचान बनाया और अब तीसरी पीढ़ी भी उसी परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रही है।

यह केवल एक कलाकार परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस भारतीय परंपरा की कहानी है जिसमें कला केवल सीखी नहीं जाती, बल्कि जी जाती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है।

सनावर अली खान ने अपने वालिद साहब जनाब मक़सूद हुसैन ख़ान साहब को याद करते हुए उनके जीवन से जुड़े कुछ ऐसे प्रसंग भी सुनाए, जिन्होंने इस विरासत के पीछे छिपे संस्कारों और सिद्धांतों को सामने ला दिया। उन्होंने बताया कि उनके पिता और गुरु ने उन्हें संगीत के साथ-साथ निष्पक्षता, अनुशासन और आत्मसम्मान का महत्व भी सिखाया।

जब पिता ने बेटे के लिए छोड़ दी जज की कुर्सी

सनावर अली खान ने बताया कि एक कार्यक्रम में वह स्वयं प्रतिभागी के रूप में शामिल हुए थे और उस कार्यक्रम में उनके पिता जनाब मक़सूद हुसैन ख़ान साहब जज की भूमिका में थे। जब उनके पिता को पता चला कि उनका बेटा भी उसी कार्यक्रम में प्रतिभागी है, तो उन्होंने स्वयं को जज की भूमिका से अलग कर लिया।

उन्होंने जज की कुर्सी छोड़ना उचित समझा, ताकि उनके बेटे के प्रदर्शन का मूल्यांकन किसी पारिवारिक संबंध के प्रभाव में न हो। सनावर अली खान के लिए यह घटना आज भी उनके वालिद साहब की महानता और निष्पक्ष व्यक्तित्व की मिसाल है।

आकाशवाणी में भी बेटे के ऑडिशन से खुद को रखा अलग

सनावर अली खान ने एक दूसरा प्रसंग नजीबाबाद आकाशवाणी से जुड़ा सुनाया। उन्होंने बताया कि जब वह आकाशवाणी में ऑडिशन देने गए, उस समय उनके वालिद साहब जनाब मक़सूद हुसैन ख़ान साहब वहां पहले से कार्यरत थे और संयोग से ऑडिशन लेने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की हो सकती थी।

लेकिन जब बेटे का ऑडिशन लेने की स्थिति बनी, तो उनके पिता उस दिन वहां उपस्थित नहीं रहे। उन्होंने अपने बेटे की प्रतिभा का मूल्यांकन स्वयं करने के बजाय खुद को उस प्रक्रिया से अलग रखना बेहतर समझा।

सनावर अली खान के लिए उनके पिता की यही सबसे बड़ी सीख थी—रिश्ता अपनी जगह है, लेकिन कला और प्रतिभा का मूल्यांकन हमेशा निष्पक्ष होना चाहिए।

आज जब सनावर अली खान स्वयं एक प्रतिष्ठित कलाकार के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं और उनके पुत्र शाहरुख खान भी देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं, तब उनके वालिद और गुरु जनाब मक़सूद हुसैन ख़ान साहब की वह सोच और भी महत्वपूर्ण नजर आती है।

दूरदर्शन केंद्र देहरादून का यह स्थापना दिवस समारोह इसलिए भी खास रहा कि मंच पर केवल एक कलाकार की प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि उसके पीछे मौजूद किराना घराने की संगीत परंपरा और तीन पीढ़ियों की कला-साधना, गुरु-शिष्य परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की पूरी कहानी भी मौजूद थी।

कार्यक्रम में दूरदर्शन केंद्र देहरादून के अधिकारियों, कलाकारों, संस्कृति प्रेमियों और अनेक गणमान्य लोगों ने हिस्सा लिया। इस अवसर पर अनिल कुमार भारती, सहायक निदेशक (कार्यक्रम), सुरेश कुमार मीणा, उप महानिदेशक (इंजीनियरिंग) सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

समारोह में कला और संस्कृति के क्षेत्र में योगदान देने वाली अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों का सम्मान भी किया गया। कार्यक्रम के अंत में ग़ज़ल और सूफी संगीत की प्रस्तुतियों ने वातावरण को भावपूर्ण बना दिया।

दूरदर्शन केंद्र देहरादून का 26वां स्थापना दिवस इस मायने में भी यादगार रहा कि इस मंच ने भारतीय संगीत की उस परंपरा को सम्मान दिया, जिसमें गुरु से शिष्य, पिता से पुत्र और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कला की लौ निरंतर आगे बढ़ती रहती है।

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