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इजराइल में 19 सीटों वाली अरब पार्टियां क्यों बनीं किंगमेकर? नेतन्याहू की राह मुश्किल

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Explained: 19 सीटों वाली अरब पार्टियां नेतन्याहू को हटाने की ‘चाबी’, लेकिन… बेहद मुश्किल क्यों?

बेनेट और लिबरमैन भी 2021-22 के उस अनुभव से जल चुके हैं, जब राम पार्टी सरकार में शामिल थी और गठबंधन जल्दी ही गिर गया था. इस वजह से दोनों ने साफ कर दिया है कि इस बार अरब पार्टियों के साथ नहीं बैठेंगे.

इजराइल के 2026 चुनाव में सबसे बड़ा ‘सियासी भूचाल’ अरब पार्टियों के खाते में आया है. जॉइंट लिस्ट और राम (Ra’am) को मिलाकर रिकॉर्ड 19 सीटें मिली हैं. पिछली बार इनके पास सिर्फ 10 सीटें थीं. यही 19 सीटें अब पूरे खेल का ‘किंगमेकर’ बन गई हैं. गणित साफ है कि नेतन्याहू के पास 53 सीटें हैं, विपक्ष (आइजनकोट) के पास 48 और अगर इन 19 को जोड़ दिया जाए तो विपक्ष 67 तक पहुंच जाता है. यह सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 से कहीं ज्यादा है.

यही वो जगह है जहां कहानी ‘मुश्किल से भी ज्यादा मुश्किल’ हो जाती है. अरब पार्टियां नेतन्याहू को रोक सकती हैं, लेकिन किसी और को सत्ता में नहीं बैठा सकतीं. पार्टियों के पास वोट हैं, लेकिन ‘मंजूरी’ नहीं है…

‘किंगमेकर’ का मतलब ‘सरकार बनाने वाला’ नहीं होता

इस पूरे संकट को समझने के लिए एक बहुत जरूरी बात समझनी होगी. अरब पार्टियों के पास जो 19 सीटें हैं, वो उन्हें ‘ब्लॉकिंग पावर’ (रोकने की ताकत) देती हैं, न कि ‘थ्रोन-मेकिंग पावर’ यानी राजा बनाने की ताकत.

इजराइल में सरकार बनाने के लिए सिर्फ वोटों का जोड़ नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वीकार्यता चाहिए. विपक्ष के नेता गादी आइजनकोट, नफ्ताली बेनेट और अविगडोर लिबरमैन कह चुके हैं कि वे अरब पार्टियों के सहारे सरकार नहीं बनाएंगे. यानी अरब पार्टियां चाहकर भी किसी को प्रधानमंत्री नहीं बना सकतीं, क्योंकि जिसे वो सत्ता में देखना चाहती हैं, वही उनका हाथ थामने से इनकार कर रहा है.

मुश्किल- 1: विपक्ष का ‘जातीय पूर्वाग्रह’

अरब पार्टियों को सत्ता से बाहर रखने की सबसे बड़ी वजह वैचारिक और जातीय दूरी है. आइजनकोट ने साफ शर्त रखी है कि वे उसी पार्टी के साथ जाएंगे जो इजराइल को यहूदी और लोकतांत्रिक राज्य मानती हो और हमास को आतंकी संगठन मानती हो.

जॉइंट लिस्ट और राम के लिए इन शर्तों को पूरा करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि उनकी राजनीति का आधार ही फिलिस्तीनी पहचान और इजराइल के ‘यहूदी राज्य’ वाले चरित्र पर सवाल उठाना रहा है.

बेनेट और लिबरमैन भी 2021-22 के उस अनुभव से जल चुके हैं, जब राम पार्टी सरकार में शामिल थी और गठबंधन जल्दी ही गिर गया था. इस वजह से दोनों ने साफ कर दिया है कि इस बार वे अरब पार्टियों के साथ नहीं बैठेंगे. यानी विपक्ष के अंदर ही एक ऐसी ‘वीटो’ बन चुकी है, जिसे तोड़ना लगभग नामुमकिन है.

मुश्किल- 2: खुद अरब पार्टियों में ‘एकजुटता’ नहीं

जॉइंट लिस्ट (12 सीटें) एक वामपंथी-राष्ट्रवादी गठबंधन है, जो पारंपरिक रूप से किसी भी जायोनी सरकार में शामिल नहीं होता और बाहर से समर्थन देता आया है. दूसरी तरफ, राम (7 सीटें) एक इस्लामी-रूढ़िवादी पार्टी है, जिसके नेता मंसूर अब्बास पिछली बार सरकार में शामिल होकर ‘मुख्यधारा’ में आने की कोशिश कर चुके हैं.

अब्बास ने तो यहां तक कह दिया है कि वे आइजनकोट के नेतृत्व वाली सरकार में सीधे शामिल होने को तैयार हैं, बशर्ते उन्हें अरब समुदाय की आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्रालय में एक पद मिले. जॉइंट लिस्ट बाहर से समर्थन देने की बात कर रही है, सरकार में शामिल होने की नहीं.

अगर विपक्ष कभी अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने की हिम्मत भी कर ले, तो उसे दो अलग-अलग तरह की शर्तों और अपेक्षाओं से जूझना पड़ेगा. इससे सरकार की स्थिरता पर सवालिया निशान लग जाता है.

मुश्किल- 3: नेतन्याहू का ‘डर का कार्ड’

नेतन्याहू इस पूरे संकट को अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल रहे हैं. नेतन्याहू ने चुनाव प्रचार में इसे ‘यहूदी बनाम अरब’ का मुकाबला बना दिया था. नेतन्याहू का नारा था ‘धार्मिक-दक्षिणपंथी सरकार या फिलिस्तीन.’ अब वे कह रहे हैं कि अरब पार्टियों के सहारे बनने वाली सरकार ‘शर्म और अपमान’ होगी. यह ‘गैर-जायोनी अरब पार्टियों’ पर निर्भर सरकार बनाना वर्जित है.

नेतन्याहू का तर्क यह है कि उनके ब्लॉक के पास ‘जायोनी जनता का निर्णायक बहुमत’ है. अगर विपक्ष अरब पार्टियों के सहारे सरकार बनाता है, तो वह ‘यहूदी वोटरों का अपमान’ होगा. लिकुड ने तो यहां तक आरोप लगा दिया कि अरब पार्टियों ने ‘रिश्वत, धमकी, हिंसा और अवैध सॉफ्टवेयर’ के जरिए चुनाव ‘चुराया’ है.

चुनाव आयोग ने अभी तक इस तरह के किसी व्यवस्थित धोखाधड़ी के सबूत नहीं पाए हैं, लेकिन इस आरोप का मकसद साफ है. अरब पार्टियों के साथ किसी भी तरह के गठबंधन को ‘राजनीतिक रूप से जहरीला’ बनाना. इस डर की वजह से विपक्ष के कई नेता खुलकर सामने नहीं आ पा रहे हैं.

मुश्किल- 4: गणित भी ’67’ जितना आसान नहीं

ऊपर से देखने पर 48+ 19= 67 का आंकड़ा बहुत साफ दिखता है, लेकिन जमीनी हकीकत इतनी आसान नहीं है:

  • डबल-एनवेलप वोट: अभी भी 4.3 से 4.8 लाख ‘डबल-एनवेलप’ वोटों की गिनती बाकी है, जो सैनिकों, पुलिसकर्मियों और विदेशों में तैनात राजनयिकों के हैं. इनकी कीमत करीब 12 सीटें मानी जा रही है. परंपरागत रूप से ये नेतन्याहू के पक्ष में जाते रहे हैं. अगर ये सीटें उन्हें मिलती हैं, तो विपक्ष का आंकड़ा और कमजोर पड़ सकता है.
  • गठबंधन की भंगुरता: अगर किसी तरह अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बन भी जाती है, तो उसे ‘अस्थिर’ माना जा रहा है. आइजनकोट को अपनी ही पार्टी के दक्षिणपंथी और धार्मिक सदस्यों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है, जो अरब पार्टियों के साथ काम करने को तैयार नहीं हैं. बेनेट की 2021 वाली सरकार इसी तरह के अंदरूनी विद्रोह की वजह से गिरी थी.

तो क्या ‘यूनिटी सरकार’ या नए चुनाव ही रास्ता हैं?

जब विपक्ष अरब पार्टियों के साथ जाने से डर रहा है और नेतन्याहू के पास बहुमत नहीं है, तो दो रास्ते बचते हैं:

  • यूनिटी सरकार: नेतन्याहू के सहयोगी इस विकल्प को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसमें आइजनकोट की पार्टी को शामिल किया जाए. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस विचार के पक्ष में माने जा रहे हैं. आइजनकोट ने साफ कर दिया है कि वे नेतन्याहू के नेतृत्व में सरकार में शामिल नहीं होंगे, चाहे रोटेशन वाला फॉर्मूला ही क्यों न हो. यानी यह रास्ता भी फिलहाल बंद दिखता है.
  • नए चुनाव: अगर कोई भी सरकार नहीं बना पाता, तो इजराइल दोबारा चुनाव की ओर बढ़ सकता है. इसका मतलब यह नहीं कि अरब पार्टियों को दोबारा 19 सीटें मिलेंगी. रिकॉर्ड मतदान (करीब 80%) के पीछे नेतन्याहू की नीतियों के खिलाफ गुस्सा था. अगर विपक्ष नेता इस मौके का फायदा नहीं उठा पाए, तो वोटर नाराज हो सकते हैं. नए चुनाव में नेतन्याहू को फिर से बहुमत मिलने की संभावना भी बनी रहती है.

अरब पार्टियों के पास ताकत, लेकिन सत्ता नहीं

इस पूरी कहानी का सार यह है कि इजराइल की राजनीति में अरब पार्टियों ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है, लेकिन उनकी जीत सत्ता तक नहीं पहुंचा सकती. वे नेतन्याहू को रोकने की ताकत जरूर रखती हैं. अगर वे समर्थन नहीं देंगे, तो नेतन्याहू 61 का आंकड़ा नहीं छू पाएंगे. वे किसी और को सत्ता में नहीं बैठा सकते, क्योंकि विपक्ष के नेता उन्हें ‘पसंद’ नहीं करते.

यह मामला ‘मुश्किल से ज्यादा मुश्किल’ दिखता है. अरब पार्टियों के पास ‘राजा बनाने’ का मौका था, लेकिन जिन्हें उन्होंने राजा बनाना चाहा, उन्होंने खुद ताज पहनने से इनकार कर दिया. अब देखना यह है कि क्या राष्ट्रपति हर्जोग की कवायद, अंतरराष्ट्रीय दबाव या कोई नया राजनीतिक समीकरण इस गतिरोध को तोड़ पाता है या इजराइल एक बार फिर चुनाव के दलदल में धकेल दिया जाता है.

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