Explained: इजराइल में कैसे ‘किंगमेकर’ बने 20% अरब अल्पसंख्यक, सरकार बनाने में निभाएंगे अहम रोल
इजरायल की कुल आबादी में लगभग 20% से 21% हिस्सा अरब नागरिकों का है. हालिया चुनावों में रिकॉर्ड मतदान के चलते अरब पार्टियों ने संसद में ऐतिहासिक सफलता दर्ज की.
इजरायल की राजनीति में पिछले कुछ चुनावों में अरब अल्पसंख्यक समुदाय (फिलिस्तीनी मूल के इजरायली नागरिक) की राजनीतिक भूमिका पूरी तरह बदल चुकी है. कभी केवल ‘विपक्ष’ या हाशिए पर रहने वाले ये दल अब इजरायली संसद में ‘किंगमेकर’ की स्थिति में आ गए हैं.
आइए इसे विस्तार से समझें कि कैसे अरब अल्पसंख्यक इस बार सत्ता के केंद्र में आए, सभी प्रमुख अरब पार्टियों की सीटों का समीकरण क्या रहा और वे सरकार बनाने में कैसे निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.
क्यों महत्वपूर्ण हैं अरब मतदाता?
इजरायल की कुल आबादी में लगभग 20% से 21% हिस्सा अरब नागरिकों का है. हालिया चुनावों में रिकॉर्ड मतदान के चलते अरब पार्टियों ने संसद में ऐतिहासिक सफलता दर्ज की.
इजरायली संसद (नेसेट) में कुल 120 सीटें हैं, और सरकार बनाने या बहुमत साबित करने के लिए 61 सीटों के जादुई आंकड़े की आवश्यकता होती है. जब यहूदी बहुसंख्यक दल आपस में बंट जाते हैं और किसी भी मुख्यधारा के गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तब लगभग 17 से 19 सीटें जीतने वाली अरब पार्टियां पूरी संसद का संतुलन तय करती हैं.
प्रमुख अरब पार्टियां और उनका सीट समीकरण
हालिया चुनावी परिणामों में अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 17 से 19 सीटें हासिल की हैं. इन्हें मुख्य रूप से दो प्रमुख राजनीतिक ताकतों में बांटा जाता है
| पार्टी / गठबंधन का नाम | वैचारिक रुख व नेतृत्व | अनुमानित सीटें | रणनीति / दृष्टिकोण |
| जॉइंट लिस्ट / हदाश-तआल |
धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी और अरब राष्ट्रवादी (नेता: आयमन ओदेह, अहमद तिबी) |
लगभग 12 सीटें | वे सरकार में सीधे शामिल होने से बचते हैं, लेकिन दक्षिणपंथी व कट्टरवादी नेतन्याहू गुट को सत्ता से रोकने के लिए विपक्षी दलों को बाहर से समर्थन देने के पक्ष में रहते हैं. |
| राअम (Ra’am – United Arab List) |
इस्लामिक और व्यावहारिक राजनीति (नेता: मंसूर अब्बास) |
लगभग 5 से 7 सीटें | यह पार्टी वैचारिक मुद्दों के बजाय अरब नागरिकों के दैनिक जीवन, बजट, नागरिक अधिकारों और अपराध नियंत्रण जैसे मुद्दों पर फोकस करती है. जरूरत पड़ने पर यह गठबंधन सरकार का हिस्सा बनने से भी पीछे नहीं हटती. |
3. यहूदी दलों का विभाजन और ‘किंगमेकर’ की स्थिति
इजरायल का राजनीतिक परिदृश्य पारंपरिक रूप से दो मुख्य धड़ों में बंटा हुआ है. पहला बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और अन्य दक्षिणपंथी-धार्मिक दल मिलकर लगभग 53 सीटें हासिल करते हैं.
दूसरी तरफ विपक्षी पार्टी का गुट है जिसमें गडी आइज़ेंकोट और अन्य मध्यमार्गी/उदारवादी दलों का ब्लॉक लगभग 48 सीटें सुरक्षित करता है.
न तो नेतन्याहू का ब्लॉक और न ही उनका विरोध करने वाला विपक्षी ब्लॉक अपने दम पर 61 के बहुमत के आंकड़े तक पहुंच पा रहा है. नेतन्याहू का ब्लॉक लगभग 53 सीटों पर अटका है, जबकि विपक्षी ब्लॉक लगभग 48 सीटों पर सिमट गया है.
यहीं पर 17 से 19 सीटें जीतने वाली अरब पार्टियां (राअम और जॉइंट लिस्ट) निर्णायक किंगमेकर बन जाती हैं.
सरकार बनाने में अरब पार्टियों की भूमिका कैसे संभव है?
अरब पार्टियों के पास सरकार के गठन को प्रभावित करने के मुख्य रूप से तीन रास्ते होते हैं:
1- यदि विपक्षी दल (जैसे आइज़ेंकोट का ब्लॉक) सरकार बनाना चाहे, तो वे सीधे कैबिनेट में अरब मंत्रियों को शामिल किए बिना, अरब पार्टियों के 17-19 सांसदों के “बाहरी समर्थन” या संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अनुपस्थित रहने के जरिए अल्पमत सरकार चला सकते हैं.
2-मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली ‘राअम’ पार्टी ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही नीतियां और अरब क्षेत्रों के विकास के लिए भारी बजट आवंटन का समझौता हो, तो वे सरकार के औपचारिक गठबंधन का हिस्सा बनने से भी गुरेज नहीं करते (जैसा उन्होंने पिछले वर्षों में बेनेट-लैपिड सरकार के दौरान किया था).
3- अधिकांश अरब मतदाता और सांसद बेंजामिन नेतन्याहू और उनके अति-राष्ट्रवादी सहयोगियों (जैसे इतामार बेन-ग्विर) की नीतियों के विरोधी हैं. ऐसे में, वे किसी भी ऐसे विकल्प का समर्थन करने के लिए तैयार रहते हैं जो देश में दक्षिणपंथी एकाधिकार को तोड़ सके.
इजरायल की राजनीति में अरब अल्पसंख्यकों का यह उभार यह दिखाता है कि अत्यधिक खंडित और विभाजित संसदीय प्रणाली में कैसे एक सीमांत या उपेक्षित समुदाय देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद और सरकार के भविष्य की चाबी अपने हाथ में ले सकता है. 17 से 19 सीटों की ताकत के साथ, आज इजरायल में कोई भी मजबूत सरकार बिना अरब पार्टियों की सहमति, मौन स्वीकृति या सीधे समर्थन के टिक नहीं सकती.