एक जून 2024 को शाम सात बजे लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण का मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल्स के नतीजे सामने आ रहे थे। इन नतीजों में उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी की शानदार जीत दिखाई जा रही थी। सभी एग्जिट पोल, भाजपा गठबंधन को उत्तर प्रदेश में 60 से अधिक सीट दे रहे थे लेकिन 4 जून को नतीजों वाले दिन का आलम ये था कि भाजपा ने 33 सीटों पर सिमट गई। 29 सीटों के नुकसान के साथ ही साथ पार्टी को सबसे बड़ा झटका अयोध्या में लगा। अयोध्या से तीन बार के सांसद रहे बीजेपी के लल्लू सिंह को हार मिली और समजावादी पार्टी को जीत।

लोकसभा चुनाव के करीब दो साल बाद अयोध्या की राजनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव एक-दूसरे को अयोध्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहे हैं। दोनों नेताओं के साथ ही साथ उनकी पार्टी के बीच भी अयोध्या विधानसभा को लेकर जुबानी जंग काफी तेज हो गई है। पिछले करीब तीन दशक से अयोध्या में बीजेपी का दबदबा रहा है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर मिली हार के बाद सपा के हौसले वहां पर काफी बुलंद हैं।

अयोध्या विधानसभा सीट फैजाबाद लोकसभा के अंदर आती है। फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र में कुल पांच विधानसभा सीटें हैं। इस सीट पर पिछले करीब 30 वर्षों में अधिकतर समय बीजेपी का कब्जा रहा है। हालांकि, अलग-अलग चुनावों में बीजेपी के वोट प्रतिशत और जीत के अंतर में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव में अयोध्या पर अपनी पकड़ बरकरार रख पाएगी।

अयोध्या विधानसभा सीट के पिछले सात चुनावों के नतीजे देखें तो यहां लंबे समय तक बीजेपी का दबदबा रहा है। 1991 में राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था। उस समय बीजेपी के उम्मीदवार लल्लू सिंह ने अयोध्या सीट पर बड़ी जीत दर्ज की थी। उन्हें 51.3 प्रतिशत वोट मिले थे और उन्होंने 30,400 वोटों के अंतर से चुनाव जीता था।1993 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के कुछ महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी लल्लू सिंह ने अपनी सीट बचा ली। हालांकि, इस बार बीजेपी का वोट प्रतिशत घटकर 47.24 प्रतिशत रह गया और जीत का अंतर भी कम होकर 9,238 वोट रह गया। इसके बाद भी लल्लू सिंह लगातार चुनाव जीतते रहे, लेकिन बीजेपी के वोट प्रतिशत में गिरावट आती गई।

1996 में पार्टी को 45.61 प्रतिशत वोट मिले। साल 2002 में यह आंकड़ा घटकर 38.72 प्रतिशत रह गया, जबकि 2007 में बीजेपी को करीब 37 प्रतिशत वोट मिले।

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी की सरकार के खिलाफ नाराजगी का माहौल था। इसी चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अयोध्या से पवन पांडेय को मैदान में उतारा। पवन पांडेय ने बीजेपी के दिग्गज नेता लल्लू सिंह को 5,404 वोटों से हरा दिया। इस चुनाव में पवन पांडेय को 28.74 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि बीजेपी का वोट प्रतिशत घटकर करीब 26 प्रतिशत रह गया था। यह नतीजा बीजेपी के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि लंबे समय बाद पार्टी को अयोध्या विधानसभा सीट गंवानी पड़ी थी।

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अयोध्या सीट पर दोबारा जीत हासिल की। पार्टी के उम्मीदवार वेद प्रकाश गुप्ता ने 49.56 प्रतिशत वोट हासिल किए और समाजवादी पार्टी के पवन पांडेय को 50,440 वोटों के बड़े अंतर से हराया। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी वेद प्रकाश गुप्ता ने जीत दर्ज की, लेकिन इस बार मुकाबला पहले से ज्यादा करीबी हो गया। बीजेपी को करीब 49 प्रतिशत वोट मिले और जीत का अंतर घटकर सिर्फ 19,990 वोट रह गया। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के पवन पांडेय का वोट प्रतिशत बढ़कर 40.4 प्रतिशत पहुंच गया। यानी 2017 के मुकाबले 2022 में बीजेपी की जीत का अंतर काफी कम हो गया और समाजवादी पार्टी ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली।

राम मंदिर के बनने के बाद ये समझा जा रहा था 2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या से भारतीय जनता पार्टी तो रिकॉर्ड बहुमत से जीत हासिल करेगी। लेकिन नतीजों में भाजपा को एक बड़ा झटका लगता है। समाजवादी पार्टी को यहां से जीत मिली । समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अवधेश प्रसाद ने बीजेपी के लल्लू सिंह को हरा दिया। सपा के इस जीत के पीछे जातीय समीकरण का अहम रोल माना जाता है।

हालांकि, एक अहम बात यह भी है कि बीजेपी फैजाबाद लोकसभा सीट हारने के बावजूद अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में 4,667 वोटों से आगे रही थी। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र की बाकी चार विधानसभा सीटों दरियाबाद, रुदौली, मिल्कीपुर और बीकापुर में बढ़त हासिल की थी। वहीं 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर अयोध्या के जातीय समीकरण की बातें होने लगी हैं।

बता दें कि, अयोध्या विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण भी चुनाव नतीजों में अहम भूमिका निभाते हैं। यहां दलित मतदाताओं की अच्छी संख्या है। इसके अलावा ब्राह्मण, मुस्लिम और यादव मतदाता भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मुस्लिम और यादव मतदाताओं को परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी का समर्थक माना जाता है। वहीं बीजेपी को सवर्ण जातियों के साथ कुर्मी, निषाद, मौर्य और राजभर जैसी पिछड़ी जातियों के कई वर्गों का समर्थन मिलता रहा है। समाजवादी पार्टी ने इस बार स्थानीय ब्राह्मण नेता पवन पांडेय पर दांव लगाने जा रही है। ऐसे में बीजेपी के सामने अपने सवर्ण वोटों को एकजुट रखने की चुनौती भी हो सकती है।

अयोध्या में जातीय समीकरणों के साथ स्थानीय समस्याएं भी मुद्दा बनने की ओर है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की हार के बाद शहर की स्थानीय समस्याओं पर भी ध्यान गया है। वहीं समाजवादी पार्टी 2024 की लोकसभा जीत और 2022 के विधानसभा चुनाव में मिले बढ़े हुए समर्थन के आधार पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगी।

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