डिजिटल युग में बौद्धिक संपदा अधिकार : चुनौतियाँ और अवसर पर पहला व्याख्यान सम्पन्न
विजडम इंडिया संवाददाता।
देहरादून, 16 मार्च।
रास बिहारी बोस सुभारती विश्वविद्यालय, देहरादून और उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद ,UCOST के संयुक्त तत्वावधान में “डिजिटल युग में बौद्धिक संपदा अधिकार : चुनौतियाँ और अवसर” विषय पर आयोजित पांच दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला का सोमवार को विधिवत शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय परिसर स्थित लोकप्रिय अस्पताल ऑडिटोरियम, सुभारतीपुरम में किया गया।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. हिमांशु ऐरन इस व्याख्यान श्रृंखला के संरक्षक के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि आज का दौर डिजिटल सूचना और रचनात्मक कार्यों का युग है, जिसमें शोध, रचनात्मकता और वैज्ञानिक उपलब्धियों की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक हो गई है। उन्होंने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार की सही समझ शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और रचनात्मक कार्य करने वालों को अपने विचारों और आविष्कारों की रक्षा करने में सक्षम बनाती है।
कुलपति प्रो. डॉ. हिमांशु ऐरन ने कहा कि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि अनुसंधान, रचनात्मक कार्यों और बौद्धिक उपलब्धियों के संरक्षण की संस्कृति विकसित करना भी है। उन्होंने UCOST, उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद द्वारा इस विषय पर सहयोग देने के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों और युवा शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगे।
प्रथम दिवस के व्याख्यान में उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के पेटेंट सूचना केंद्र में वैज्ञानिक श्री हिमांशु गोयल ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ बढ़ती पायरेसी, साहित्यिक चोरी और डेटा चोरी जैसी चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने मुखर होकर स्वदेशी उत्पादों के संरक्षण की भी बात की और कहा कि भारत की पेटेंट एवं बौद्धिक संपदा नीतियों के कारण ही हल्दी, नीम और कोल्हापुरी चप्पल जैसे स्वदेशी उत्पादों पर किसी विदेशी कंपनी का कब्जा नहीं हो पाया।
उन्होंने कहा कि इंटरनेट के दौर में ज्ञान का आदान-प्रदान पहले से अधिक तेज और व्यापक हुआ है, लेकिन इसके साथ कॉपीराइट संरक्षण, बौद्धिक उपलब्धियों की सुरक्षा और तकनीकी प्रवर्तन भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) का प्रभावी उपयोग शोध को उद्योग से जोड़ने और नई संभावनाओं को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

कार्यक्रम का प्रथम सत्र ऐलाईड मेडिकल साइंसेज विभाग के समन्वय में आयोजित किया गया। व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत आगामी दिनों में विभिन्न विशेषज्ञ वक्ता विद्यार्थियों को IPR के विविध पहलुओं से परिचित कराएंगे।
विश्वविद्यालय द्वारा जारी सूचना के अनुसार व्याख्यान श्रृंखला के आगामी सत्रों में भारत सरकार की ओर से वरिष्ठ वैज्ञानिक डा संगीता नागर प्रो. डॉ. राजेश सिंह उत्तरांचल विश्वविद्यालय, डॉ. अनुज रतूड़ी, तथा श्री अंकुश विभिन्न तिथियों पर अपने विचार प्रस्तुत करेंगे।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति डॉ. देश दीपक, रिसर्च कॉर्डिनेटर डॉ. प्रतिभा जुयाल, डॉ. पुष्पा ध्यानी, श्री सूरज सिंह एवं डॉ. पात्रा की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। प्रतिभागियों ने कहा कि डिजिटल युग में बौद्धिक संपदा अधिकार, IPR की जानकारी उनके शैक्षणिक और शोध कार्यों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित होगी।

