आम भारतीय जनमानस से जब – कभी भारत के विश्वस्त वैश्विक मित्र का प्रश्न किया जाए तो सबसे पहला नाम रूस का ही आता है इसके अनेक ऐतिहासिक व सामरिक उदाहरण भी रहे हैं जहां दोनों राष्ट्रों ने संकट के समय अद्वितीय कूटनीतिक एवं रणनीतिक साझेदारी का परिचय देकर विश्व राजनीति को अपने पक्ष में किया है परंतु हाल के दिनों में अमेरिकी दबाव, युद्ध परिस्थितियों व व्यापार असंतुलन के इस दौर ने दोनों पक्षों को दीर्घकालिक लक्ष्यों पर पुनर्विचार करने हेतु प्रेरित किया है ऐसे में भारतीय विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर कि रूस यात्रा ने संभावनाओं के नए द्वार खोले हैं


यूं तो भारत रूस मैत्रीपूर्ण संबंधों का इतिहास स्वतंत्रता संघर्ष के दिनों तक जाता है परंतु स्वतंत्र भारत ने 1947 से ही दो ध्रुवीय विश्व में जिस सावधानी से रूस के समाजवादी स्वरूप को भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं में मिलाया वह अभूतपूर्व था ।पंडित नेहरू की नीतियों चाहे वे पंचवर्षीय योजनाएं रही हो या फिर भारी उद्योगों का विकास सभी में रूस के सकारात्मक सहयोग की स्पष्ट छाप दिखती रही । दूसरी और रूस ने भी कश्मीर मुद्दे पर जिस प्रकार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दृढ़ता से भारतीय हितों को संरक्षण दिया उसने भी दोस्ती की बुनियादों को मजबूती देने का कार्य किया बाद में 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध और भारत सोवियत शांति मैत्री व सहयोग संधि ने व्यापार ,आर्थिक , वैज्ञानिक व तकनीकी सहयोग की नई इबारत को पहचान दी। हालांकि 1991 में सोवियत रूस के विघटन ने विश्व को एक ध्रुवीय बना दिया जिसने दोनों राष्ट्रों के मध्य विकास व सहयोग की रफ्तार को धीमा किया परंतु अटल बिहारी सरकार में 2000 में हुई रणनीतिक साझेदारी व मनमोहन सरकार द्वारा 2010 में हुई विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी की घोषणा के साझा प्रयासों ने दिल्ली मास्को संबंधों को नई ऊर्जा प्रदान की । जिसे 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली पूर्ण बहुमत सरकार में 2014 से 2024 के मध्य मिली अभूतपूर्व गति ने नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का कार्य किया।
जहां एक और रक्षा क्षेत्र में एस – 400 ने वायु रक्षा प्रणाली को मजबूती दी साथ ही ब्रह्मोस मिसाइल सहयोग व कामोव हेलीकॉप्टर ने मेक इन इंडिया के अनुरूप रक्षा उत्पादन व तकनीक हस्तांतरण पर जोर दिया । वहीं गगनयान मिशन में रूस के सहयोग ने भारत के इसरो व रॉसकॉस्मोस की संयुक्त उपलब्धियां को एक नवीन शिखर प्रदान किया। यही कारण थे कि वर्ष 2014 में जहां दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 10 अरब डॉलर तक था वह आज 60 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, जिसे वर्ष 2030 तक 100 अरब डालर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है ।
यह सभी तथ्य स्पष्ट करते हैं कि पिछले एक दशक में दोनों देशों के मध्य रक्षा, व्यापार ,तकनीक व सांस्कृतिक स्तर पर सहयोग को नवीन प्रगाड़ता मिली है। परंतु वर्तमान परिदृश्य में दोनों राष्ट्रों के सम्मुख कई चुनौतियां भी विद्यमान है । संयुक्त राज्य अमेरिका की टैरिफ नीति ने एक और जहां दोनों राष्ट्रों की व्यापार को संकुचित तो किया ही है ,साथ ही एशिया में ईरान व यूरोप में यूक्रेन युद्ध ने भी इसे नुकसान पहुंचाया है। इस पर संयुक्त राज्य अमेरिका की डॉलर को वैश्विक व्यापार के लिए थोपने की नीति ने भी रूस के निवेश को हतोत्साहित किया है । दूसरी ओर भारत भी जहाँ एक ओर कच्चा तेल, उर्वरक व कोयले के आयात हेतु रूस पर पूर्णतः निर्भर तो है साथ ही लगातार हो रहे व्यापार घाटे से चिंतित भी। क्योंकि आज भी 60 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार में भारत का आयात 55 अरब डॉलर व निर्यात मात्र 5 अरब डॉलर तक सीमित है।
इन परिस्थितियों में भारतीय विदेश मंत्री का भारत रूस अंतर सरकारी आयोग की बैठक में भाग लेना , राष्ट्रपति पुतिन से मिलना ओर द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना समय की जरूरत भी बन गया है गौरतलब है कि इसी वर्ष 12 -13 सितंबर में भारत को नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी भी करनी है जिसमें डिजिटल करेंसी जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारत व रूस के रुख का सभी पक्षकारों को इंतजार है। ऐसे में यह दर्शनीय होगा कि नवीन वैश्विक चुनौतियां को सुलझाने में भारतीय विदेश मंत्री की रूस यात्रा कितनी सफल रही । जिसकी पहली झलक ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता पर भी तय करेगी।

लेखक – रमन कृष्ण किमोठी
सहायक निदेशक ( इंटरनेशनल स्टूडेंट ग्लोबल रिलेशन)
रास बिहारी बोस सुभारती विश्वविद्यालय

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